ऊर्जा के श्रोत
Class 10 Physics | NCERT Chapter 6 | Board Exam Weightage: 5-7 Marks
ऊर्जा (Energy)
परिभाषा:
कार्य करने की क्षमता को ऊर्जा कहते हैं। इसका S.I मात्रक जूल (Joule) है, जिसे J से सूचित किया जाता है।
ऊर्जा का स्रोत (Sources of energy):
जिन विशिष्ट स्रोतों से प्राप्त ऊर्जा का उपयोग कर सकते हैं, उसे ऊर्जा का स्रोत कहते हैं।
महत्वपूर्ण तथ्य:
(i) ऊर्जा का अच्छा स्रोत ईंधन को माना जाता है।
(ii) सूर्य को ऊर्जा का मूल स्त्रोत (Ultimate Source) माना जाता है।
(i) ऊर्जा का अच्छा स्रोत ईंधन को माना जाता है।
(ii) सूर्य को ऊर्जा का मूल स्त्रोत (Ultimate Source) माना जाता है।
ऊर्जा के उत्तम स्रोत (Good Sources of Energy)
उत्तम स्रोत होने के लिए विशेषताएँ:
- प्रति इकाई आयतन या प्रति इकाई द्रव्यमान से अधिक ऊर्जा की आपूर्ति होनी चाहिए।
- इसका भंडारण और परिवहन आसानी से किया जाना चाहिए।
- इसे आसानी से प्राप्त किया जाना चाहिए।
- इसे सस्ता होना चाहिए।
- वातावरण को कम प्रदूषित करने वाला होना चाहिए।
ईंधन (Fuels)
परिभाषा:
वे सब पदार्थ जो जलकर उष्मा प्रदान करते हैं, उन्हें ईंधन कहते हैं।
जैसे: कोयला, लकड़ी, किरोसीन, पेट्रोल, डीजल, प्राकृतिक गैस आदि।
आदर्श ईंधन (Ideal fuels):
वैसा ईंधन जो जलकर अच्छी मात्रा में उष्मा उत्पन्न करता है तथा जलने से वातावरण को दूषित नहीं करता है, उसे आदर्श ईंधन कहते हैं।
आदर्श ईंधन की विशेषताएँ:
- इसका ऊष्मीय मान उच्च होना चाहिए।
- इसे सस्ता और आसानी से प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होना चाहिए।
- इसके जलने के बाद कोई हानिकारक पदार्थ नहीं उत्पन्न होना चाहिए।
- इसका ज्वलन ताप उपयुक्त होना चाहिए।
- इसका दहन न तो अत्यंत मंद और न ही अत्यंत तीव्र होना चाहिए।
- इसमें वाष्पशील पदार्थों की मात्रा कम होनी चाहिए।
- इसका भंडारण एवं परिवहन आसानी से किया जाना चाहिए।
ऊर्जा स्रोत के प्रकार (Type of Sources of Energy)
प्रकार 1
नवीकरणीय और अनवीकरणीय
Renewable and Non-renewable
प्रकार 2
परंपरागत और गैर-परंपरागत
Conventional and Non-conventional
नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत (Renewable Sources)
परिभाषा:
वैसा ऊर्जा स्रोत जिसे समाप्त नहीं किया जा सकता अर्थात् उपयोग करने के बाद उसे हटाकर पुनः उसका उपयोग बार-बार ऊर्जा उत्पन्न करने में किया जा सकता है, उसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत कहते हैं।
जैसे: सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल विद्युत ऊर्जा, भू-तापीय ऊर्जा इत्यादि।
विशेष जानकारी: प्रकृति में यह स्रोत असीमित मात्रा में उपलब्ध है।
अनवीकरणीय ऊर्जा स्रोत (Non-renewable Sources)
परिभाषा:
वैसा ऊर्जा स्रोत जो समाप्त हो अर्थात् जिसे एक बार उपयोग के बाद पुनः उपयोग में नहीं लाया जा सकता है, उसे अनवीकरणीय ऊर्जा स्रोत कहते हैं।
जैसे: कोयला, तेल, प्राकृतिक गैस इत्यादि।
परंपरागत ऊर्जा स्रोत (Conventional Sources)
वैसा ऊर्जा स्रोत जिनका उपयोग व्यापक तौर पर किया जाता है तथा आवश्यक ऊर्जा के अधिकांश भाग की आपूर्ति की जाती है, तो उसे परंपरागत ऊर्जा स्रोत कहते हैं।
जैसे: जीवाश्म ईंधन, जैव द्रव्यमान ऊर्जा, पवन ऊर्जा इत्यादि।
गैर-परंपरागत ऊर्जा स्रोत (Non-conventional Sources)
वैसा ऊर्जा स्रोत जिसका उपयोग व्यापक तौर पर नहीं किया जा सकता है, साथ ही आवश्यक ऊर्जा की आपूर्ति सीमित मात्रा में होती है, तो उसे गैर-परंपरागत ऊर्जा स्रोत कहते हैं।
जैसे: सौर ऊर्जा, तरंग ऊर्जा, भू-तापीय ऊर्जा इत्यादि।
जीवाश्म ईंधन (Fossil fuel)
पेड़-पौधे एवं जंतुओं के अवशेष लाखों वर्षों तक पृथ्वी के अंदर दबकर ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में अधिक ताप एवं दाब के कारण ईंधनों में परिवर्तित हो जाते हैं, जिसे जीवाश्म ईंधन कहते हैं।
जैसे: कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस।
वर्तमान स्थिति: वर्तमान में ऊर्जा के अधिकांश भाग की आपूर्ति जीवाश्म ईंधन द्वारा ही की जाती है।
कोयला (Coal)
कोयला पृथ्वी के अंदर व्यापक रूप में पाया जाता है। वैज्ञानिकों का मत है कि प्राचीनकाल में अनेक जंगल जब पृथ्वी के सतह के नीचे दब गए तब पृथ्वी के गर्मी, ऊपरी सतह की विशाल दाब तथा हवा के अभाव में पेड़-पौधों के अपघटन के फलस्वरूप कोयले का निर्माण हुआ। इस कोयले को खनिज कोयला भी कहते हैं।
इसमें 60-90% कार्बन की मात्रा पाई जाती है। इसके अलावे गंधक, नाइट्रोजन, लोहा इत्यादि के यौगिक भी उपस्थित रहते हैं।
भारत में कोयला: यह भारत के झारखंड, उड़ीसा, आंध्रप्रदेश, मध्य प्रदेश तथा पश्चिम बंगाल में पाया जाता है। यह विशेष रूप से झारखंड के झरिया तथा बेरमो तथा पश्चिम बंगाल के रानीगंज में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है।
तथ्य: भारत में कोयला के कुल भंडार का लगभग 33% हिस्सा झारखंड में है।
तथ्य: भारत में कोयला के कुल भंडार का लगभग 33% हिस्सा झारखंड में है।
कोयले के प्रकार:
1
पीट (Peat)निम्न कोटी का कोयला, 60% कार्बन। खाना बनाने में उपयोग।
2
लिग्नाइट (Lignite)67% कार्बन, अधिक धुआँ तथा कम ऊष्मा।
3
बिटुमिनस (Bituminous)10-80% कार्बन, अल्प धुआँ तथा अधिक ऊष्मा।
4
एन्थ्रासाइट (Anthracite)96% कार्बन, उत्तम कोटी, महँगा।
कोयला का उपयोग:
(i) खाना बनाने तथा पानी को गर्म करने में।
(ii) तापीय विद्युत संयंत्र में विद्युत उत्पन्न करने के लिए।
(iii) अन्य रासायनिक उद्योगों में।
(iv) सोना या अन्य धातुओं को गलाने के लिए भी ईंधन के रूप में।
कोयला को जलाने से हानियाँ:
(i) यह जलने पर काफी धुँआ उत्पन्न करता है।
(ii) इसको जलाने पर CO₂ एवं CO गैस उत्पन्न होता है। CO₂ वातावरण को प्रदूषित करता है जबकि CO जहरीली गैस है।
(iii) इससे उत्सर्जित SO₂ एवं नाइट्रोजन पानी के साथ मिलकर अम्लीय वर्षा (Acid rain) कर सकते हैं।
(iv) यह एक अनवीकरणीय ऊर्जा स्रोत है, जो लगभग 100 वर्षों में समाप्त हो जाएगा।
पेट्रोलियम (Petroleum)
यह ग्रीक शब्द Petra तथा oleum से बना है जिसका शाब्दिक अर्थ 'चट्टान का तेल' होता है। अर्थात् Petra = Rock (चट्टान) तथा Oleum = Oil (तेल)। प्रायः पेट्रोलियम प्राकृतिक हाइड्रोकार्बन का मिश्रण है जो ठोस, द्रव या गैस के रूप में चट्टानों में पाया जाता है। विशेष रूप से हाइड्रोकार्बन का द्रव रूप ही पेट्रोलियम या कच्चा तेल कहलाता है।
महत्वपूर्ण तथ्य:
1. यह गाढ़ा चिपचिपा, गहरे काले या भूरे रंग का गंधयुक्त अतिज्वलनशील तैलीय द्रव है।
2. इसके शोधन के लिए भंजन आसवन विधि (Fractional distillation method) का उपयोग किया जाता है।
3. इसे काला सोना (Black gold) भी कहते हैं।
4. यह विश्व स्तर पर 36% एवं भारत में 27% ऊर्जा की आपूर्ति करता है।
5. भारत पेट्रोलियम उत्पाद का विश्व में 4 वाँ सबसे बड़ा उपभोक्ता है।
6. भारत में पेट्रोलियम का शोधन आसाम दिगबोई, बिहार के बरौनी, पश्चिम बंगाल के हल्दिया, आंध्रप्रदेश के विशाखापत्तनम में किया जाता है।
1. यह गाढ़ा चिपचिपा, गहरे काले या भूरे रंग का गंधयुक्त अतिज्वलनशील तैलीय द्रव है।
2. इसके शोधन के लिए भंजन आसवन विधि (Fractional distillation method) का उपयोग किया जाता है।
3. इसे काला सोना (Black gold) भी कहते हैं।
4. यह विश्व स्तर पर 36% एवं भारत में 27% ऊर्जा की आपूर्ति करता है।
5. भारत पेट्रोलियम उत्पाद का विश्व में 4 वाँ सबसे बड़ा उपभोक्ता है।
6. भारत में पेट्रोलियम का शोधन आसाम दिगबोई, बिहार के बरौनी, पश्चिम बंगाल के हल्दिया, आंध्रप्रदेश के विशाखापत्तनम में किया जाता है।
प्राकृतिक गैस (Natural Gas)
प्राकृतिक गैस पानी के नीचे स्थित वानस्पतिक पदार्थ के ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में अनाक्सी जीवाणुओं द्वारा उत्पन्न अपघटन से बनती है। यह भी एक जीवाश्म ईंधन है। वास्तव में यह मीथेन, एथेन तथा प्रोपेन गैसों का मिश्रण है। इसका मुख्य अवयव मीथेन है।
विशेषताएँ:
1. इस गैस में लगभग 95% मीथेन उपस्थित रहता है।
2. इसमें मीथेन के प्रतिशत अधिक होने के कारण यह अत्यधिक ज्वलनशील है।
3. इसकी ऊर्जा घनत्व 34-38 MJ/m³ है।
4. विश्व स्तर पर यह 21% एवं भारत में 7% ऊर्जा की आपूर्ति करती है।
5. भारत लगभग 70% प्राकृतिक गैस का भंडार मुंबई हाई बेसिन एवं गुजरात में है।
1. इस गैस में लगभग 95% मीथेन उपस्थित रहता है।
2. इसमें मीथेन के प्रतिशत अधिक होने के कारण यह अत्यधिक ज्वलनशील है।
3. इसकी ऊर्जा घनत्व 34-38 MJ/m³ है।
4. विश्व स्तर पर यह 21% एवं भारत में 7% ऊर्जा की आपूर्ति करती है।
5. भारत लगभग 70% प्राकृतिक गैस का भंडार मुंबई हाई बेसिन एवं गुजरात में है।
तापीय विद्युत संयंत्र (Thermal Power Plant)
यह एक ऐसा संयंत्र होता है जिसके द्वारा विद्युत उत्पन्न किया जाता है। इसमें मुख्यतः कोयला या तेल को जलाकर विद्युत उत्पन्न किया जाता है। इसलिए तापीय विद्युत संयंत्र कोयला या तेल के क्षेत्रों के निकट स्थापित किए गए हैं।
संपीड़ित प्राकृतिक गैस (CNG)
उच्च दाब पर जब प्राकृतिक गैस को द्रव रूप में संग्रहित किया जाता है तो उसे संपीड़ित प्राकृतिक गैस कहते हैं। इसे संक्षेप में CNG कहते हैं। इसके उपयोग से बहुत ही कम प्रदूषण होता है।
पेट्रोलियम गैस (Petroleum Gas)
यह गैस एथेन, प्रोपेन तथा ब्यूटेन का मिश्रण है। इसका मुख्य अवयव ब्यूटेन है। ये सभी अवयव आसानी से जलते हैं। इसलिए इसे ऊष्मा ऊर्जा का स्रोत माना जाता है।
द्रवित पेट्रोलियम गैस (LPG)
वह पेट्रोलियम गैस जिसे दबाव के अधीन द्रवित किया जाता है, उसे द्रवित पेट्रोलियम गैस (LPG) कहते हैं। इसका मुख्य अवयव ब्यूटेन होता है। वास्तव में यह गैस नॉर्मल ब्यूटेन तथा आइसो ब्यूटेन का द्रवीभूत मिश्रण है।
जल विद्युत ऊर्जा (Hydro Electric Energy)
परिभाषा:
बहते जल की गतिज ऊर्जा से उत्पन्न विद्युत ऊर्जा को जल विद्युत ऊर्जा कहते हैं तथा वह संयंत्र जो बड़े पैमाने पर बहते जल से विद्युत उत्पन्न करता है, उसे जल विद्युत संयंत्र कहते हैं।
महत्व: बहता जल ऊर्जा का एक प्रमुख स्रोत है।
जल विद्युत ऊर्जा से लाभ:
1. यह ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए आवश्यक जल मुफ्त में उपलब्ध हो जाता है।
2. यह ऊर्जा प्रदूषण रहित होता है।
3. नदियों पर बाँध बनाने से बाढ़ नियंत्रण में मदद तो मिलती ही है साथ ही साथ सिंचाई के लिए जल उपलब्ध रहता है।
4. जल विद्युत ऊर्जा अपेक्षाकृत सस्ता होता है।
जल विद्युत ऊर्जा से हानियाँ:
1. यह ऊर्जा उसी नदी के समीप उत्पन्न की जा सकती है, जहाँ सालों भर जल उपलब्ध रहता है।
2. इस ऊर्जा को एक जगह से दूसरे जगह भेजने में काफी खर्च होता है।
3. इसके लिए बाँध बनाने में उपजाऊ (उर्वर) भूमि का बहुत बड़ा भाग नष्ट हो जाता है।
4. जल विद्युत संयंत्र स्थापित होने पर पुनर्वास (Rehabilitation) की समस्या उत्पन्न हो जाती है।
भारत में प्रमुख जल विद्युत परियोजनाएँ:
1. भारत में कुल ऊर्जा का 23% ही ऊर्जा की आपूर्ति जल विद्युत ऊर्जा द्वारा की जाती है।
2. भाखड़ा नंगल परियोजना - हिमाचल प्रदेश (सतलज नदी)
3. हीराकुंड परियोजना - उड़ीसा (महानदी)
4. चमेरा जल विद्युत परियोजना - हिमाचल प्रदेश (रावी नदी)
5. नथपा-भक्री जल विद्युत परियोजना - हिमाचल प्रदेश (सतलज नदी) - एशिया में सबसे बड़ी
1. भारत में कुल ऊर्जा का 23% ही ऊर्जा की आपूर्ति जल विद्युत ऊर्जा द्वारा की जाती है।
2. भाखड़ा नंगल परियोजना - हिमाचल प्रदेश (सतलज नदी)
3. हीराकुंड परियोजना - उड़ीसा (महानदी)
4. चमेरा जल विद्युत परियोजना - हिमाचल प्रदेश (रावी नदी)
5. नथपा-भक्री जल विद्युत परियोजना - हिमाचल प्रदेश (सतलज नदी) - एशिया में सबसे बड़ी
बायोमास (Biomass)
पेड़-पौधे तथा जानवरों के शरीर में निहित जैव पदार्थ को बायोमास (जैवमात्रा) कहते हैं।
बायोगैस (Biogas)
पेड़-पौधे तथा जानवरों के शरीर से प्राप्त व्यर्थ सूक्ष्म जीवों द्वारा जल की उपस्थिति में आसानी से सड़ते हैं। इस प्रक्रिया में मीथेन (CH₄), CO₂, हाइड्रोजन सल्फाइड (H₂S) इत्यादि गैस निकलती है। इस गैसीय मिश्रण को बायोगैस कहते हैं।
इसका मुख्य अवयव मीथेन है जिसकी उपस्थिति लगभग 75% है। यह एक उत्तम ईंधन है।
बायोगैस से लाभ:
1. यह जलने के बाद धुआँ नहीं देता है।
2. इसका उपयोग घरेलू कार्यों में आसानी से लाया जा सकता है।
3. इसके जलने से पर्याप्त ऊष्मा उत्पन्न होती है।
4. इस गैस के समाप्ति के बाद नाइट्रोजन एवं फॉस्फोरस पदार्थ बच जाते हैं, जिससे इसका उपयोग उर्वरक के रूप में किया जाता है।
5. इसका उपयोग गलियों में रौशनी तथा इंजन चलाने में भी किया जा सकता है।
6. इसके उपयोग से जंगल कटाई को रोका जा सकता है।
बायोगैस संयंत्र (Biogas Plant):
बायोगैस को जिस संयंत्र में उत्पन्न किया जाता है, उसे बायोगैस संयंत्र कहते हैं।
हमारे देश में दो प्रकार के बायोगैस संयंत्र उपयोग में लाए जाते हैं:
प्रकार 1
स्थिर गुंबदनुमा गैसटंकीFixed dome type Biogas plant
प्रकार 2
तैरती हुई गैसटंकीFloating gas-holder type Biogas plant
दोनों बायोगैस (गोबर गैस) संयंत्र एक ही सिद्धांत पर कार्य करते हैं। दोनों संयंत्रों में से एक में गैस के गुबदनुमा टंकी स्थिर रहती है तथा दूसरे में गैसटंकी जल में तैरती रहती है।
इनमें जानवरों के गोबर और जल के मिश्रण की लेयर जैसा बनाकर टंकी में डालते हैं। इसे कर्दम (Slurry) कहते हैं। बने हुए गैस नालियों के द्वारा उपयोग में लाया जाता है। गैस के लगातार पूर्ति के लिए समय-समय पर टंकी में गोबर डाले जाते हैं, जिससे गैस बनता रहता है।
चारकोल (Charcoal)
जब लकड़ी को सीमित वायु की उपस्थिति में जलाया जाता है तो उसमें उपस्थित जल एवं वाष्पशील पदार्थ बाहर निकल जाते हैं तथा गहरे काले रंग का अवशेष बचता है जिसे चारकोल या लकड़ी का कोयला कहते हैं।
महत्व: यह लकड़ी की अपेक्षा अच्छा ईंधन माना जाता है क्योंकि लकड़ी मात्र 17 KJ/g ऊर्जा उत्पन्न करती है जबकि चारकोल 33 KJ/g ऊर्जा देती है। यह जलने के बाद बहुत कम धुआँ देता है।
पवन ऊर्जा (Wind Energy)
तीव्र गति से बढ़ती हुई हवा को पवन कहते हैं। बहती हुई हवा को काफी गतिज ऊर्जा होती है। इस ऊर्जा का उपयोग परंपरागत रूप से पवन चक्कियों को चलाने में किया जाता है। आजकल पवन ऊर्जा जो ऊर्जा का नवीकरणीय स्रोत है, इसका उपयोग विद्युत उत्पन्न करने में किया जाता है।
पवन चक्की (Wind Mill):
ऐसी युक्ति जो पवन ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा या विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करता है, उसे पवन चक्की कहते हैं।
विशेष तथ्य:
1. पवन चक्की को चलाने के लिए पवन का वेग कम-से-कम 15 km/h होना चाहिए।
2. डेनमार्क को पवनों का देश कहा जाता है।
3. पवन ऊर्जा द्वारा विद्युत उत्पादन करने में डेनमार्क का स्थान प्रथम है, जबकि भारत का स्थान 5वाँ है।
4. भारत लगभग 1030 MW विद्युत शक्ति का उत्पादन पवन ऊर्जा द्वारा करता है।
5. भारत में विशालतम पवन ऊर्जा फॉर्म तमिलनाडु में कन्याकुमारी के समीप स्थापित किया है जहाँ 380 MW विद्युत शक्ति का उत्पादन किया जाता है।
1. पवन चक्की को चलाने के लिए पवन का वेग कम-से-कम 15 km/h होना चाहिए।
2. डेनमार्क को पवनों का देश कहा जाता है।
3. पवन ऊर्जा द्वारा विद्युत उत्पादन करने में डेनमार्क का स्थान प्रथम है, जबकि भारत का स्थान 5वाँ है।
4. भारत लगभग 1030 MW विद्युत शक्ति का उत्पादन पवन ऊर्जा द्वारा करता है।
5. भारत में विशालतम पवन ऊर्जा फॉर्म तमिलनाडु में कन्याकुमारी के समीप स्थापित किया है जहाँ 380 MW विद्युत शक्ति का उत्पादन किया जाता है।
सौर ऊर्जा (Solar Energy)
परिभाषा:
सूर्य से निकलने वाली ऊर्जा को सौर ऊर्जा कहते हैं। यह ऊर्जा उष्मा एवं प्रकाश के रूप में प्राप्त होती है।
सौर स्थिरांक (Solar constant):
पृथ्वी के वायुमंडल की परिरेखा पर सूर्य की किरणों के लंबवत स्थित खुले क्षेत्र के प्रति इकाई क्षेत्रफल पर प्रति सेकेंड पहुँचनेवाली सौर ऊर्जा को सौर स्थिरांक कहते हैं जबकि इस क्षेत्र को सूर्य से पृथ्वी के बीच की औसत दूरी माना गया है।
सौर स्थिरांक = 1.4 KJ/sec m² या 1.4 KW/m²
ध्यान दें:
1. पृथ्वी के सतह पर प्राप्त सौर ऊर्जा का मान हमेशा सौर स्थिरांक के मान से कम होता है।
2. सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में हरे पेड़-पौधे भी प्रकाश संश्लेषण (Photo Synthesis) विधि द्वारा अपना भोजन तैयार करता है।
1. पृथ्वी के सतह पर प्राप्त सौर ऊर्जा का मान हमेशा सौर स्थिरांक के मान से कम होता है।
2. सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में हरे पेड़-पौधे भी प्रकाश संश्लेषण (Photo Synthesis) विधि द्वारा अपना भोजन तैयार करता है।
सौर ऊर्जा के उपयोग:
सौर कुकर
खाना बनाने में
खाना बनाने में
सौर जल हीटर
पानी गर्म करने में
पानी गर्म करने में
सौर सेल
विद्युत उत्पन्न करने में
विद्युत उत्पन्न करने में
प्रकाश संश्लेषण
पौधे भोजन बनाते हैं
पौधे भोजन बनाते हैं
कपड़े सुखाना
धूप में सुखाने में
धूप में सुखाने में
सौर भट्टी
धातुओं को गलाने में
धातुओं को गलाने में
सौर ऊर्जा से लाभ:
1. यह नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत है।
2. यह ऊर्जा का अपार स्रोत है।
3. यह किसी भी खुले स्थान पर प्राप्य है।
4. यह प्रदूषण रहित है।
सौर ऊर्जा की सीमाएँ:
1. सौर पैनल बनाने में चाँदी का उपयोग होता है, इसलिए इसकी लागत अधिक होती है।
2. इसकी दक्षता (efficiency) कम है।
3. सौर ऊर्जा की प्राप्ति केवल दिन में आकाश स्वच्छ रहने पर ही होती है। अतः यह एक विश्वसनीय स्रोत नहीं है।
4. सौर शक्ति घर बनाना अत्यधिक खर्चीला है।
सौर ऊर्जा युक्तियाँ:
सोलर कुकर
यह एक ऐसी युक्ति है जिसके द्वारा सूर्य से सौर ऊर्जा प्राप्त करके उसे ऊष्मा ऊर्जा में बदलकर खाना बनाया जाता है।
प्रकार: 1. बॉक्स टाइप सोलर कुकर 2. अवतल परावर्तक टाइप सोलर कुकर
सोलर कुकर से लाभ:
1. इससे बना भोजन सस्ता होता है।
2. इससे किसी प्रकार का प्रदूषण उत्पन्न नहीं होता है।
3. यह गैस, तेल या लकड़ी जैसे ईंधन को बचाता है।
4. इसमें खाना कम ताप पर धीरे-धीरे बनता है इसलिए पौष्टिक तत्वों का क्षय नहीं होता है।
सोलर कुकर से हानियाँ:
1. रात में भोजन नहीं बनाया जा सकता है।
2. खाना बनाने में काफी अधिक समय लगता है।
3. ऐसे कुकर द्वारा अधिक मात्रा में भोजन नहीं तैयार किया जा सकता है।
4. चापाती नहीं बनायी जा सकती है।
5. हमेशा परावर्तक समतल दर्पण को सूर्य की ओर घुमाना पड़ता है।
अन्य सौर युक्तियाँ:
सौर जल तापक
Solar water Heater
Solar water Heater
सौर भट्टी
Solar Furnace
Solar Furnace
सौर सेल (Solar cell):
ऐसी युक्ति जो प्रत्यक्षतः सौर ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित कर देता है उसे सौर सेल कहते हैं।
तकनीकी जानकारी:
1. सौर सेल बनाने के लिए अर्धचालक का उपयोग किया जाता है।
2. अर्धचालक सिलिकॉन एवं जर्मेनियम का बना होता है।
1. सौर सेल बनाने के लिए अर्धचालक का उपयोग किया जाता है।
2. अर्धचालक सिलिकॉन एवं जर्मेनियम का बना होता है।
सौर पैनल (Solar Panel):
जब बहुत अधिक संख्या में सौर सेल को एक निश्चित पैटर्न में संयोजित करके इच्छानुसार विभवांतर प्राप्त किया जाता है तो इस प्रकार की व्यवस्था को सौर पैनल कहते हैं।
सौर सेल का उपयोग:
1. कैलकुलेटर, कलाई घड़ी, अनेक खिलौने इत्यादि में।
2. सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में विद्युत बल्ब को जलाने में।
3. रेडियो सेट या बेतार संचार तंत्रों को चलाने में।
4. कृत्रिम उपग्रहों तथा अंतरिक्ष अन्वेषक युक्तियों में विद्युत ऊर्जा की आपूर्ति के लिए।
सौर सेल की सीमाएँ:
1. यह सिलिकॉन का बना होता है। यह महँगा होता है।
2. सौर पैनल में लगे सौर सेल सर्वश्रेष्ठ चालक चाँदी के तार से संयोजित रहता है। चाँदी भी काफी महँगा होता है।
3. सौर पैनल से जुड़ा संचायक बैटरी केवल दिष्ट धारा ही आपूर्ति करता है।
4. इससे सिर्फ दिन में ही विद्युत की आपूर्ति संभव है।
भू-तापीय ऊर्जा (Geo-Thermal energy)
परिभाषा:
पृथ्वी के परपटी के तप्त स्थल में संचित ऊष्मा ऊर्जा को भू-तापीय ऊर्जा कहते हैं अथवा पृथ्वी के अंदर की ऊर्जा को भू-तापीय ऊर्जा कहते हैं।
पृथ्वी की संरचना में तीन परतें होती हैं:
भूपर्पटी
(Crust)
सबसे ऊपरी भाग
(Crust)
सबसे ऊपरी भाग
प्रावार
(Mantle)
मध्य परत
(Mantle)
मध्य परत
कोर
(Core)
सबसे आंतरिक भाग
(Core)
सबसे आंतरिक भाग
महत्वपूर्ण तथ्य:
1. भूपर्पटी सबसे ऊपरी भाग तथा कोर सबसे आंतरिक भाग होता है।
2. भूपर्पटी तथा कोर के बीच में प्रावार होता है।
3. प्रावार वाले क्षेत्रों में उच्च ताप पर पिघली चट्टाने गैसे तथा भाप होती है जिसे मैग्मा (Magma) कहते हैं।
4. विश्व का सबसे बड़ा भू-तापीय विद्युत शक्ति संयंत्र दी गीजर्स (The geysers) जो USA के सन-फ्रांसिस्को के नजदीक है जिसकी उत्पादन क्षमता 2000 MW है।
1. भूपर्पटी सबसे ऊपरी भाग तथा कोर सबसे आंतरिक भाग होता है।
2. भूपर्पटी तथा कोर के बीच में प्रावार होता है।
3. प्रावार वाले क्षेत्रों में उच्च ताप पर पिघली चट्टाने गैसे तथा भाप होती है जिसे मैग्मा (Magma) कहते हैं।
4. विश्व का सबसे बड़ा भू-तापीय विद्युत शक्ति संयंत्र दी गीजर्स (The geysers) जो USA के सन-फ्रांसिस्को के नजदीक है जिसकी उत्पादन क्षमता 2000 MW है।
भू-तापीय ऊर्जा से लाभ:
1. यह एक नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत है।
2. यह एक विश्वसनीय ऊर्जा स्रोत है।
3. यह प्रदूषण रहित स्वच्छ ऊर्जा का स्रोत है।
4. इसमें ग्रीन हाउस गैसें उत्सर्जित नहीं होती हैं।
5. इससे विद्युत ऊर्जा करने में कम खर्च होता है।
भू-तापीय ऊर्जा की सीमाएँ:
1. भौगोलिक रूप से उपयुक्त कुछ ही स्थान ऐसे हैं जहाँ भू-तापीय ऊर्जा उपलब्ध है।
2. इस ऊर्जा को प्राप्त करने के लिए काफी गहरा छेद करना पड़ता है जो उच्च तकनीकी पर आधारित होता है, जो काफी महँगा होता है।
3. इसके लिए खुदाई जोखिम भरा एवं खर्चीला है।
4. पृथ्वी के अंदर सुराख बनाए जाने के कारण कुछ खतरनाक गैसें बाहर आ सकती हैं।
समुद्रों से ऊर्जा (Energy from Sea)
1. ज्वारीय ऊर्जा (Tidal Energy):
मुख्य रूप से चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण के कारण समुन्द्र में जल का स्तर चढ़ता तथा गिरता रहता है। इस परिघटना को ज्वार भाटा कहते हैं। ज्वार-भाटों में जल के स्तर के चढ़ने तथा गिरने से ज्वारीय ऊर्जा प्राप्त होती है।
तथ्य: ज्वार-भाटा घटना के दौरान इसे काफी मात्रा में यांत्रिक ऊर्जा होती है। इस यांत्रिक ऊर्जा का उपयोग विद्युत ऊर्जा प्राप्त करने में किया जाता है।
ज्वारीय ऊर्जा से लाभ:
1. यह ऊर्जा का नवीकरण स्रोत है।
2. इससे प्रदूषण रहित बिजली मिलती है।
3. बार-बार बांध बनाने की आवश्यकता नहीं होती है।
4. यह उत्तम ऊर्जा स्रोतों में से एक है।
ज्वारीय ऊर्जा से हानियाँ:
1. अधिक मात्रा में विद्युत की उत्पत्ति नहीं की जा सकती है।
2. इसमें बिजली रुक-रुक कर मिलती है।
3. खाड़ी के खास क्षेत्र में ही बाँध बनाया जा सकता है।
4. बाँध बनाना काफी महँगा होता है।
5. ज्वार-भाटा कुछ ही जगहों पर आते हैं। अतः इनकी उपलब्धता सीमित है।
2. तरंग ऊर्जा (Wave Energy):
महासागरों के आर-पार प्रबल पवन बहती है तो तरंगें उत्पन्न होती हैं। इन तरंगों की गतिज ऊर्जा होती है। तरंग की यह गतिज ऊर्जा समुद्र के जल को गतिशील बना देता है। इस गतिशील जल की गतिज ऊर्जा जनित्र के टरबाइन को घुमाता है तथा विद्युत की उत्पत्ति हो जाती है।
विशेषताएँ:
1. यह नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत है तथा प्रदूषण रहित स्वच्छ ऊर्जा है।
2. ज्वारीय ऊर्जा पानी के ढेर के समूहिक गति पर निर्भर करती है जबकि तरंग हवाओं द्वारा उत्पन्न गतिज ऊर्जा के वाहक (carrier) का काम करती है।
1. यह नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत है तथा प्रदूषण रहित स्वच्छ ऊर्जा है।
2. ज्वारीय ऊर्जा पानी के ढेर के समूहिक गति पर निर्भर करती है जबकि तरंग हवाओं द्वारा उत्पन्न गतिज ऊर्जा के वाहक (carrier) का काम करती है।
3. महासागरीय तापीय ऊर्जा (Ocean Thermal Energy):
समुद्र में जल के विभिन्न परतों के बीच तापांतर के कारण उत्पन्न ऊर्जा को महासागरीय तापीय ऊर्जा (OTE) कहते हैं।
OTEC = Ocean Thermal Energy Conversion (महासागरीय तापीय ऊर्जा रूपांतरण)
महासागरीय तापीय ऊर्जा से लाभ:
1. यह ऊर्जा का नवीकरणीय स्रोत है।
2. इससे प्रदूषण रहित स्वच्छ ऊर्जा प्राप्त होती है।
3. इससे भविष्य में सस्ते दर पर विद्युत उत्पन्न किया जा सकता है।
4. यह विलवणीकृत (desalinated) जल भी उत्पादित करता है, जिसका उपयोग खेती, उद्योग एवं घरेलू जरूरतों के लिए किया जा सकता है।
महासागरीय तापीय ऊर्जा की सीमाएँ:
1. वर्तमान में OTEC द्वारा उत्पादित बिजली की लागत, जीवाश्मी ईंधनों की अपेक्षा अधिक है।
2. OTEC संयंत्र केवल उन्हीं स्थानों पर लगाए जा सकते हैं, जहाँ सालों भर तापक्रम का अंतर कम से कम 20°C रहे।
3. OTEC संयंत्र एवं इनसे संबंधित पाइप लाइन प्रतिस्थापित करने में लागत अधिक है।
4. OTEC संयंत्र लगाने एवं पाइप लाइन बिछाने से स्थानीय समुद्री पर्यावरण को नुकसान पहुँच सकता है।
नाभिकीय ऊर्जा (Nuclear Energy)
परिभाषा:
जब किसी परमाणु के नाभिक पर न्यूट्रॉन आदि कणों से बमबारी की जाती है तो वह नाभिक विखंडित हो जाता है। इस क्रिया में अत्यधिक ऊर्जा मुक्त होती है। इसी ऊर्जा को नाभिकीय ऊर्जा या परमाणु कहते हैं।
E = Δmc²
जहाँ; E = ऊर्जा, Δm = द्रव्यमान में कमी, C = प्रकाश का वेग
जहाँ; E = ऊर्जा, Δm = द्रव्यमान में कमी, C = प्रकाश का वेग
मात्रक:
1. 1eV = 1.6 × 10⁻¹⁹ J
2. 1MeV = 10⁶ eV
3. नाभिकीय ऊर्जा को इलेक्ट्रॉन वोल्ट (eV) में व्यक्त किया जाता है।
1. 1eV = 1.6 × 10⁻¹⁹ J
2. 1MeV = 10⁶ eV
3. नाभिकीय ऊर्जा को इलेक्ट्रॉन वोल्ट (eV) में व्यक्त किया जाता है।
नाभिकीय ऊर्जा की उपयोगिता:
विद्युत उत्पादन
स्पेस रिसर्च
सुरक्षा
नाभिकीय अभिक्रिया (Nuclear Reaction):
परमाणु के नाभिक में होनेवाली अभिक्रिया को नाभिकीय अभिक्रिया कहते हैं। इस अभिक्रिया की खोज सबसे पहले रदरफोर्ड ने 1919 ई० में किया।
जब किसी परमाणु के नाभिक में दो प्रोटॉन परस्पर टकराते हैं तो मूल कणों से बिल्कुल भिन्न प्रकार के कण उत्पन्न होते हैं और इस अभिक्रिया में विभिन्न तरंगदैर्ध्य वाले प्रकाश के रूप में ऊर्जा निकलती है जिसे नाभिकीय अभिक्रिया कहते हैं।
₁P¹ + ₁P¹ → ₁P¹ + ₀n¹ + ₁e⁰ + ₀n⁰ + ऊर्जा
(न्यूट्रॉन) (पॉज़िट्रॉन) (न्यूट्रीनो)
(न्यूट्रॉन) (पॉज़िट्रॉन) (न्यूट्रीनो)
नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion):
जब दो हल्के नाभिक परस्पर संयोग करके एक भारी तथा स्थायी नाभिक का निर्माण करते हैं तथा अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा उत्सर्जन होता है, उसे नाभिकीय संलयन कहते हैं।
₁H² + ₁H² → ₁H³ + ₁H¹ + E
₁H² + ₁H³ → ₂He⁴ + ₀n¹ + E
₁H² + ₁H³ → ₂He⁴ + ₀n¹ + E
नाभिकीय विखंडन (Nuclear Fission):
जब एक भारी तथा अस्थायी नाभिक विखंडित होकर दो हल्के एवं स्थायी नाभिकों में परिवर्तित हो जाता है तथा अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा उत्सर्जन होता है, उसे नाभिकीय विखंडन कहते हैं।
₉₂U²³⁵ + ₀n¹ → ₅₆Ba¹³⁹ + ₃₆Kr⁹⁴ + 3₀n¹ + E
श्रृंखला अभिक्रिया (Chain Reaction):
जब U-235 के नाभिक में एक मंद वेग वाला न्यूट्रॉन प्रवेश करता है तो यह नाभिक विखंडित होकर अन्य नाभिकों के अतिरिक्त तीन अन्य न्यूट्रॉन तो उत्पन्न करते ही हैं और साथ में काफी मात्रा में ऊर्जा मुक्त करते हैं। ये तीनों अतिरिक्त न्यूट्रॉन यदि मंद वेग वाले हो तो ये तीन अन्य U-235 के नाभिकों पर प्रहार कर उन्हें विखंडित कर देते हैं। इस प्रकार में 9 अतिरिक्त न्यूट्रॉन प्राप्त होते हैं। पुनः यह 9 अतिरिक्त न्यूट्रॉन 9 अन्य नाभिकों को विखंडित करते हैं जिसके फलस्वरूप 27 अन्य न्यूट्रॉन प्राप्त होते हैं। इस प्रकार यह प्रक्रिया तब तक चलती रहती है जबतक कि U-235 के सभी नाभिक विखंडित नहीं हो जाते। यह क्रिया विस्फोट के साथ होती है। इसलिए इस क्रिया को श्रृंखला अभिक्रिया कहते हैं।
नियंत्रित विखंडन-अभिक्रिया (Controlled Fission Reaction):
जिस विखंडन के प्रत्येक चरण में विखंडित होने वाले परमाणुओं की संख्या नियत होती है तो उसे नियंत्रित विखंडन अभिक्रिया कहते हैं। इसी सिद्धांत के आधार पर परमाणु रिएक्टर का निर्माण होता है।
परमाणु रिएक्टर (Atomic or Nuclear Reactor):
वह संयंत्र जिसमें नाभिकीय ऊर्जा को ऊष्मा ऊर्जा में परिवर्तित करके विद्युत ऊर्जा प्राप्त की जाती है, उसे परमाणु रिएक्टर कहते हैं।
इतिहास: परमाणु रिएक्टर इटली के वैज्ञानिक एनरिको फर्मी (Enrico Fermi) का देन है। इन्होंने 2 दिसंबर, 1942 को संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) में परमाणु (नाभिकीय) रिएक्टर को प्रारंभ किया था।
परमाणु रिएक्टर के भाग:
1
कोर (Core)यूरेनियम के छड़ों का बना होता है जिस पर एल्युमिनियम धातु की परत चढ़ा दी जाती है। इसी कोर में ही विखंडन श्रृंखला अभिक्रिया होती है।
2
मंदक (Moderator)कैडमियम या बोरॉन धातु की छड़ होती है जो परमाणु रिएक्टर में न्यूट्रॉनों का वेग कम कर देता है।
3
शीतक (Coolant)ऊष्मा को बाहर निकालने का कार्य करता है।
4
परिरक्षण (Shielding)रेडियोधर्मी किरणों से सुरक्षा प्रदान करता है।
नाभिकीय ऊर्जा से लाभ:
1. नाभिकीय ऊर्जा से उत्पन्न बिजली की कीमत लगभग कोयला के बराबर होती है। अतः यह महँगा नहीं पड़ती है।
2. यह धुआँ पैदा नहीं करती है। इससे CO₂ और ग्रीन हाउस गैसें नहीं निकलती है।
3. यह कम ईंधन से विशाल ऊर्जा पैदा करती है।
4. यह एक विश्वसनीय ऊर्जा है।
नाभिकीय ऊर्जा से हानियाँ:
1. इसमें बहुत अपशिष्ट नहीं बचता परंतु इसका अपशिष्ट काफी खतरनाक हैं, इसे अच्छी तरह बंद कर जमीन में गाड़ दिया जाता है, क्योंकि यह रेडियोधर्मी किरणें उत्सर्जित करता है।
2. यदि अपशिष्ट का भंडारण और निस्तारण (Disposal) उचित ढंग से नहीं होता है तो वह पर्यावरण को दूषित कर सकता है।
3. नाभिकीय संयंत्रों में सुरक्षा उपायों पर काफी खर्च करना पड़ता है।