Bihar Board Class 10 Science – अम्ल, क्षारक एवं लवण Complete Guide

अम्ल, क्षारक एवं लवण
Acids, Bases and Salts

Chemical Reactions and Equations Class 10 Notes

अम्ल को अंग्रेजी में Acid कहते हैं। Acid शब्द की उत्पत्ति लैटिन शब्द Acidus (ऐसिडस) से हुई है जिसका अर्थ होता है खट्टा

मुख्य परिभाषाएँ

अम्ल (Acid)

अम्ल ऐसा पदार्थ जिसका जलीय विलयन नीले लिटमस पत्र को लाल कर देता है और जलीय विलयन का स्वाद खट्टा होता है। यह धातुओं के साथ अभिक्रिया करके गैस मुक्त करता है तथा क्षारीय विलयनों से सल्फर को अवक्षेपित करने का गुण रखता है।

क्षारक (Base)

क्षारक एक ऐसा पदार्थ है जो लाल लिटमस पत्र को नीला कर देता है तथा इसका स्वाद कड़वा होता है। यह अम्लों को उदासीन कर लवण बनाता है तथा छूने पर साबुन की तरह चिकना प्रतीत होता है।

क्षारक को अंग्रेजी में Bases कहते हैं। Bases को Alkali (एल्कली) भी कहते हैं। Alkali शब्द अरबी भाषा के शब्द Al-qili (अल-क्यूली) से बना है जिसका अर्थ होता है पौधे का भस्म (राख)

आरहेनियस द्वारा अम्ल तथा क्षारक की परिभाषा

अम्ल (Acid)

वह पदार्थ जो जल में घुलकर हाइड्रोजन आयन (H⁺) देता है, उसे अम्ल कहते हैं।

जैसे: HCl, H₂SO₄, HNO₃ आदि।

HCl → H⁺ + Cl⁻
NOTE: हाइड्रोजन आयन (H⁺) जलीय विलयन में स्वतंत्र रूप से नहीं रह सकता, यह जल के अणुओं से जुड़कर हाइड्रोनियम आयन (H₃O⁺) बना देता है।

क्षारक (Base)

वह पदार्थ जो जल में घुलकर हाइड्रोक्साइड आयन (OH⁻) देता है, उसे क्षारक कहते हैं।

जैसे: NaOH, KOH, Ca(OH)₂ आदि।

NaOH → Na⁺ + OH⁻
NOTE:
(i) सभी क्षारक जल में घुलनशील नहीं होते हैं।
(ii) जल में विलेय क्षारक को क्षार (Alkali) कहते हैं।
(iii) सभी क्षार, क्षारक होते हैं लेकिन सभी क्षारक, क्षार नहीं होते हैं।

प्रबल एवं दुर्बल अम्ल तथा क्षारक

प्रबल अम्ल (Strong Acid)

वे अम्ल जो जल में घुलकर लगभग पूर्णतः आयनित होकर हाइड्रोजन आयन (H⁺) प्रदान करते हैं, उसे प्रबल अम्ल कहते हैं।

जैसे: HCl, H₂SO₄, HNO₃ आदि।

दुर्बल अम्ल (Weak Acid)

वे अम्ल जो जलीय विलयन में सिर्फ अंशतः आयनित होकर कम मात्रा में हाइड्रोजन आयन (H⁺) प्रदान करते हैं, उसे दुर्बल अम्ल कहते हैं।

जैसे: कार्बनिक अम्ल (H₂CO₃), एसिटिक अम्ल (CH₃COOH) आदि।

प्रबल क्षारक (Strong Base)

वे क्षार जो जलीय विलयन में लगभग पूर्णतः आयनित होकर काफी मात्रा में हाइड्रॉक्साइड आयन (OH⁻) प्रदान करते हैं, उसे प्रबल क्षारक कहते हैं।

जैसे: NaOH, KOH आदि।

दुर्बल क्षारक (Weak Base)

वे क्षार जो जलीय विलयन में सिर्फ अंशतः आयनित होकर कम मात्रा में हाइड्रॉक्साइड (OH⁻) प्रदान करते हैं, तो उसे दुर्बल क्षारक कहते हैं।

जैसे: NH₄OH, Ca(OH)₂, Mg(OH)₂ आदि।

सूचक (Indicator)

ऐसा पदार्थ जो अपने रंग परिवर्तन के द्वारा पदार्थों के अम्लीय या क्षारीय या उदासीन होने की सूचना देता है, उसे सूचक कहते हैं। इसको अम्ल-क्षारक सूचक भी कहते हैं।

जैसे: लिटमस, मेथिल ऑरेंज, फीनॉल्फथैलिन आदि।

गंधीय सूचक (Olfactory Indicator)

ऐसा पदार्थ जिनकी गंध अम्लीय या क्षारीय माध्यम में बदल जाती है। इस प्रकार के पदार्थ को गंधीय सूचक कहते हैं।

जैसे: प्याज, वैनिला, लौंग का तेल आदि।

मुख्य सूचकों का रंग परिवर्तन तालिका

सूचक अम्लीय क्षारीय उदासीन
लाल लिटमस लाल नीला लाल
नीला लिटमस लाल नीला नीला
मेथिल ऑरेंज लाल पीला नारंगी
फिनॉल्फथैलिन रंगहीन गुलाबी रंगहीन

अम्लों के रासायनिक गुण

1. अम्ल का धातुओं से अभिक्रिया

धातु, अम्लों से हाइड्रोजन को विस्थापित करता है और अम्ल के शेष अवशिष्टों से मिलकर धातु एक यौगिक बनाता है। इस यौगिक को लवण कहते हैं!

अतः अम्ल धातुओं से अभिक्रिया कर प्रायः लवण तथा हाइड्रोजन गैस बनता है।

अर्थात्: धातु + अम्ल → लवण + हाइड्रोजन गैस

Zn + H₂SO₄ → ZnSO₄ + H₂↑

2. अम्ल का धातु कार्बोनेट से अभिक्रिया

सभी धातु कार्बोनेट अम्ल से अभिक्रिया कर संगत लवण, H₂O तथा CO₂ बनाता है।

अर्थात्: धातु कार्बोनेट + अम्ल → लवण + जल + CO₂ गैस

CaCO₃ + 2HCl → CaCl₂ + H₂O + CO₂↑

3. अम्ल का धातु बाइकार्बोनेट से अभिक्रिया

सभी धातु बाइकार्बोनेट अम्ल से अभिक्रिया कर संगत लवण, जल तथा CO₂ गैस बनता है।

अर्थात्: धातु बाइकार्बोनेट + अम्ल → लवण + जल + CO₂↑

NaHCO₃ + HCl → NaCl + H₂O + CO₂↑

4. अम्ल से धात्विक ऑक्साइड एवं हाइड्रॉक्साइड की अभिक्रियाएँ

अम्ल धात्विक ऑक्साइड एवं हाइड्रॉक्साइड से अभिक्रिया कर लवण एवं जल बनता है।

अर्थात्: धात्विक ऑक्साइड / हाइड्रॉक्साइड + अम्ल → लवण + जल

CuO + H₂SO₄ → CuSO₄ + H₂O
Cu(OH)₂ + 2HCl → CuCl₂ + 2H₂O

5. अम्ल का क्षारकों से अभिक्रिया

अम्ल एवं क्षारक अभिक्रिया कर लवण तथा जल बनते हैं।

अर्थात्: अम्ल + क्षारक → लवण + जल

HCl + NaOH → NaCl + H₂O

क्षारकों के भौतिक गुण

  1. यह स्वाद में कड़वा होता है।
  2. इसके जलीय विलयन छूने में साबुन जैसा चिकना लगता है।
  3. अधिकांश क्षारक रंगहीन होते हैं।
  4. NH₄OH को छोड़कर सभी क्षारक गंधहीन होते हैं।
  5. कुछ क्षारक जल में विलेय तथा कुछ अविलेय होते हैं!
Note: जल में विलेय क्षारक को क्षार या Alkali कहते हैं।
जैसे: NaOH, KOH, NH₄OH आदि।

क्षारकों के रासायनिक गुण

1. क्षारक का धातु से अभिक्रिया

क्षारक कुछ धातुओं से अभिक्रिया करके लवण तथा हाइड्रोजन गैस बनाता है।

Zn + 2NaOH → Na₂ZnO₂ + H₂↑
Note: यह अभिक्रिया सभी धातु के साथ संभव नहीं है।

2. लिटमस के साथ अभिक्रिया

क्षारक लिटमस के साथ अभिक्रिया कर लाल लिटमस को नीला रंग में परिवर्तित करते हैं परंतु नीले लिटमस पर इनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। फीनॉल्फथैलिन को गुलाबी रंग में बदल देता है। मिथाइल ऑरेंज को पीला रंग में बदल देता है।

3. अधात्विक ऑक्साइड के साथ अभिक्रिया

अधात्विक ऑक्साइड के साथ क्षारक अभिक्रिया कर लवण तथा जल देता है।

2NaOH + CO₂ → Na₂CO₃ + H₂O

4. जलीय विलयन में क्षारक की स्थिति

जलीय विलयन क्षारक आयन प्रदान करते हैं।

NaOH → Na⁺ + OH⁻
Mg(OH)₂ → Mg²⁺ + 2OH⁻

5. अम्लों से अभिक्रिया

क्षारक अम्ल से अभिक्रिया कर लवण तथा जल बनाता है।

2NaOH + H₂SO₄ → Na₂SO₄ + 2H₂O

⚖️ विलयनों के प्रकार

उदासीन विलयन (Neutral Solution)

जिस विलयन में हाइड्रोजन आयनों [H⁺] का सांद्रण हाइड्रोक्साइड आयनों [OH⁻] के सांद्रण के बराबर होते हैं, उसे उदासीन विलयन कहते हैं।

[H⁺] = [OH⁻]
[H⁺][OH⁻] = 10⁻⁷ M (मोलर)

अम्लीय विलयन (Acidic Solution)

जिस विलयन में हाइड्रोजन आयनों [H⁺] का सांद्रण हाइड्रॉक्साइड आयनों [OH⁻] के सांद्रण से अधिक होते हैं, उसे अम्लीय विलयन कहते हैं।

[H⁺] > [OH⁻]
[H⁺] > 10⁻⁷ M तथा [OH⁻] < 10⁻⁷ M

क्षारीय विलयन (Alkaline Solution)

जिस विलयन में हाइड्रोजन आयनों [H⁺] का सांद्रण हाइड्रॉक्साइड आयनों [OH⁻] के सांद्रण से कम होता है, उसे क्षारक विलयन कहते हैं।

[H⁺] < [OH⁻]
[H⁺] < 10⁻⁷ M और [OH⁻] > 10⁻⁷ M

pH-स्केल

किसी विलयन की अम्लीयता, क्षारीयता तथा उदासीनता को व्यक्त करने के लिए एक मापदंड का इस्तेमाल किया जाता है, जिसे pH-स्केल या pH-मापदंड कहते हैं।

pH की परिभाषा

किसी विलयन में हाइड्रोजन आयनों के सांद्रण के व्युत्क्रम के लघुगणक को उस विलयन का pH कहते हैं।

pH = log(1/[H⁺])
⇒ pH = -log[H⁺]

उदासीन जल का pH

उदासीन जल में हाइड्रोजन आयनों [H⁺] का सांद्रण 10⁻⁷ M होता है।

pH = -log[H⁺] = -log 10⁻⁷ = -(-7)log 10 = 7
(∵ log 10 = 1)

अतः उदासीन विलयन का pH 7 होता है।

अम्लीय विलयन का pH

अम्लीय विलयन में हाइड्रोजन आयनों [H⁺] का सांद्रण 10⁻⁷ M से अधिक होता है।

माना कि [H⁺] = 10⁻⁶ M
∴ pH = -log[H⁺] = -log 10⁻⁶ = -(-6)log 10 = 6

अतः अम्लीय विलयन का pH मान हमेशा 7 से कम होता है।

क्षारीय विलयन का pH

क्षारीय विलयन में हाइड्रोजन आयनों [H⁺] का सांद्रण 10⁻⁷ M से कम होता है।

माना कि [H⁺] = 10⁻⁸ M
∴ pH = -log[H⁺] = -log 10⁻⁸ = -(-8)log 10 = 8

अतः क्षारीय विलयन का pH मान हमेशा 7 से अधिक होता है।

pH स्केल का सारांश:
• pH = 7 → उदासीन
• pH < 7 → अम्लीय (0 से 7)
• pH > 7 → क्षारीय (7 से 14)

दैनिक जीवन में pH का महत्व

  1. अधिकांश जीवाणुओं की वृद्धि उदासीन या क्षारीय माध्यम में ही अच्छी तरह से होती है।
  2. किण्वन एंजाइम द्वारा जब अपघटन, कई यौगिकों के अवक्षेपण आदि में विलयन के pH पर नियंत्रण रखना आवश्यक हो जाता है!
  3. रक्त एवं पेशाब के pH मान में बहुत ही कम का परिवर्तन होता है। रक्त के pH में यदि थोड़ा भी परिवर्तन आ जाए तो शरीर में कई प्रकार के कष्ट उत्पन्न हो सकते हैं।
  4. यह जानने के लिए कि मिट्टी कृषि योग्य या उर्वरक डालने योग्य है या नहीं, उसकी अम्लीयता या क्षारीयता की पूर्व जानकारी बहुत जरूरी है।
  5. जल का pH मापकर ही यह जाना जा सकता है कि जल मछलियों और पौधे के जीवन के लिए उपयुक्त है या नहीं।

अम्ल एवं क्षारक में अंतर

अम्ल क्षारक
1. इसका स्वाद खट्टा होता है। 1. यह स्वाद कड़वा होता है।
2. यह नीले लिटमस पत्र को लाल करता है। 2. इसका लाल लिटमस पत्र को नीला करता है।
3. यह जल में विलेय होकर हाइड्रोजन आयन [H⁺] देता है। 3. यह जल में विलेय होकर हाइड्रॉक्साइड आयन [OH⁻] देता है।
4. यह क्षारक को उदासीन कर देता है। 4. यह अम्ल को उदासीन कर देता है।
5. इसका pH मान 7 से कम होता है। 5. इसका pH मान 7 से अधिक होता है।
6. यह मेथिल ऑरेंज को लाल कर देता है। 6. यह मेथिल ऑरेंज को पीला कर देता है।

🧂 लवण (Salt)

धातु, अम्लों से हाइड्रोजन को विस्थापित करता है और अम्लों के शेष अवशिष्टों से मिलकर धातु एक यौगिक बनता है। इस यौगिक को ही लवण कहते हैं।

2NaOH + H₂SO₄ → Na₂SO₄ + 2H₂O
लवण के मुख्य गुण:
(i) लवण प्रायः ठोस होते हैं।
(ii) इसके गलनांक एवं क्वथनांक उच्च होते हैं।
(iii) ये जल में घुलनशील (विलेय) होते हैं।
(iv) इसके जलीय विलयन विद्युत का चालन करते हैं।

कुछ उपयोगी लवण

1. सोडियम क्लोराइड (साधारण लवण)

यह सोडियम और क्लोरिन के संयोग से बनता है। इसका अणु सूत्र NaCl होता है। यह समुद्र के जल में अधिक मात्रा में पाई जाती है। ठोस के रूप में इसे कुछ पहाड़ों, चट्टानों से प्राप्त किया जाता है।

बनाने की विधि: सोडियम हाइड्रॉक्साइड तथा हाइड्रोक्लोरिक अम्ल के अभिक्रिया से सोडियम क्लोराइड प्राप्त होता है।

NaOH + HCl → NaCl + H₂O

उपयोग:

  • दैनिक जीवन में।
  • हाइड्रोक्लोरिक अम्ल बनाने में।
  • कॉस्टिक सोडा, धोने वाला सोडा, बेकिंग सोडा बनाने में।
  • क्लोरिन गैस बनाने में।
Note 1:
(i) सोडियम क्लोराइड (NaCl) में अशुद्धि के रूप में मैग्नीशियम क्लोराइड (MgCl₂) उपस्थित रहता है जिसके कारण इसे खुली हवा में छोड़ देने पर पसीजने लगता है।

(ii) साधारण लवण में थोड़ी मात्रा में पोटैशियम आयोडेट (KIO₃) या पोटैशियम आयोडाइड (KI) मिलाकर आयोडिनयुक्त नमक तैयार किया जाता है जिससे घेघा रोग (goitre) या आयोडीन की कमी के कारण होनेवाली अन्य बीमारी उत्पन्न न हों।

2. सोडियम हाइड्रॉक्साइड (कॉस्टिक सोडा)

सोडियम हाइड्रॉक्साइड एक महत्वपूर्ण रसायन है जिसे कॉस्टिक सोडा के नाम से जाना जाता है। इसका अणु सूत्र NaOH होता है।

बनाने की विधि: सोडियम क्लोराइड के जलीय विलयन में विद्युत प्रवाहित करने पर यह अपघटित होकर सोडियम हाइड्रॉक्साइड, क्लोरीन और हाइड्रोजन गैस बनाता है।

2NaCl + 2H₂O → 2NaOH + Cl₂↑ + H₂↑
Note: इस प्रक्रिया में क्लोरिन (क्लोर) एवं सोडियम हाइड्रॉक्साइड (क्षार) निर्मित होते हैं, इसलिए इस प्रक्रिया को क्लोर-क्षार प्रक्रिया कहते हैं।

उपयोग:

  • धातुओं से ग्रीज हटाने में।
  • साबुन, अपमार्जक एवं कागज के निर्माण में।
  • कृत्रिम फाइबर, वस്ത्र, रेशे आदि के निर्माण में।
  • बॉक्साइड अयस्क के शुद्धिकरण में।
  • पेट्रोलियम के शुद्धिकरण में।

3. सोडियम बाइकार्बोनेट (बेकिंग सोडा)

सोडियम बाइकार्बोनेट को सोडियम हाइड्रोजन कार्बोनेट या खाने वाला सोडा भी कहते हैं जिसका समान्य सूत्र NaHCO₃ होता है। इसे प्रायः अमोनिया सोडा विधि या साल्वे विधि द्वारा बनाया जाता है।

बनाने की विधि: अमोनिया से संतृप्त सोडियम क्लोराइड के जलीय घोल में CO₂ गैस प्रवाहित करने पर सोडियम हाइड्रोजन कार्बोनेट का सफेद अवक्षेप प्राप्त होता है।

NaCl + H₂O + NH₃ + CO₂ → NH₄Cl + NaHCO₃↓

गुण:

  1. यह सफेद रवेदार ठोस पदार्थ है।
  2. यह जल में कम घुलनशील है।
  3. इसका जलीय विलयन क्षारीय होता है।
  4. इसका pH मान 7 से अधिक होता है।

उपयोग:

  • बेकिंग पाउडर बनाने में।
  • औषधि के रूप में शरीर की अम्लता दूर करने में।
  • प्रयोगशाला में प्रतिकारक के रूप में।
  • शराब में।
  • सोडा अम्ल अग्निशामक यंत्र में।

4. सोडियम कार्बोनेट (धोने का सोडा)

सोडियम कार्बोनेट प्रायः अमोनिया सोडा विधि या साल्वे विधि से तैयार किया जाता है। इसका अणु सूत्र Na₂CO₃·10H₂O होता है।

बनाने की विधि: सोडियम बाइकार्बोनेट को कसकर गर्म करने पर ठोस सोडियम कार्बोनेट प्राप्त होता है।

2NaHCO₃ → Na₂CO₃ + H₂O + CO₂↑

प्राप्त ठोस सोडियम को जल में घुलाकर विलयन का रवाकरण (क्रिस्टलीकृत) करने पर घोवन सोडा प्राप्त होता है।

Na₂CO₃ + 10H₂O → Na₂CO₃·10H₂O

गुण:

  1. यह सफेद रवेदार ठोस पदार्थ है।
  2. यह जल में विलेय है।
  3. इसका जलीय घोल (विलयन) क्षारीय होता है।
  4. इसको गर्म करने पर 10 अणु रवा जल को खो देता है और निर्जलीय Na₂CO₃ बनाता है।

उपयोग:

  • साबुन, कागज, काँच आदि के निर्माण में।
  • खारा जल को मृदु बनाने में।
  • कपड़ा साफ करने में।
  • सोडियम हाइड्रॉक्साइड और सोडियम के अन्य यौगिक के निर्माण में।
  • पेट्रोलियम को शुद्ध करने में।

5. विरंजक चूर्ण (Bleaching Powder)

इसका रासायनिक नाम कैल्सियम ऑक्सी क्लोराइड है जिसका अणु सूत्र CaOCl₂ होता है। इसे चूना का क्लोराइड भी कहते हैं।

बनाने की विधि: ठोस बुझे हुए चूने पर 40°C (313K) ताप पर क्लोरिन गैस प्रवाहित करने से विरंजक चूर्ण प्राप्त होता है।

Ca(OH)₂ + Cl₂ → CaOCl₂ + H₂O

गुण:

  1. यह हल्का पीला लिए सफेद चूर्ण है।
  2. इसमें क्लोरीन जैसी गंध होती है।
  3. यह अस्थाई यौगिक है।
  4. वायु में खुला छोड़ देने पर इससे Cl₂ गैस बाहर निकल जाती है।
  5. यह तनु अम्लों से अभिक्रिया कर Cl₂ गैस बनाता है।

उपयोग:

  • कागज एवं कपड़ों के विरंजन में।
  • कीटाणुनाशक के रूप में।
  • दूषित या कीटाणुयुक्त जल को पीने योग्य बनाने में।
  • क्लोरोफार्म (CHCl₃) के निर्माण में।
  • कई रसायन उद्योगों में एक अपचायक के रूप में।

6. प्लास्टर ऑफ पेरिस (Plaster of Paris)

इसका रासायनिक नाम कैल्सियम सल्फेट हेमीहाइड्रेट है जिसका अणु सूत्र CaSO₄·½H₂O या (CaSO₄)₂·H₂O होता है। इसे संक्षेप में P.O.P कहते हैं।

बनाने की विधि: जिप्सम (CaSO₄·2H₂O) को सावधानीपूर्वक 100°C ताप पर गर्म करने पर यह अपने रवाकरण के जल को अंशतः खोकर प्लास्टर ऑफ पेरिस बनता है।

CaSO₄·2H₂O → CaSO₄·½H₂O + 1½H₂O
2[CaSO₄·2H₂O] → (CaSO₄)₂·H₂O + 3H₂O

उपयोग:

  • टूटी हुई हड्डियों को प्लास्टर करने में।
  • खिड़कियों, दरवाजों के छिद्रों को बंद करने में।
  • खिलौनों, सजावट के सामानों, मूर्तियों तथा इसके साँचे बनाने में।
  • प्रयोगशाला में अनावश्यक छिद्र को बंद करने में।
  • अग्नि-रोधक पदार्थ बनाने में।
NOTE: इसके तापक्रम को 100°C से अधिक नहीं बढ़ने दिया जाता है, क्योंकि अधिक गर्म करने पर इसके शीघ्रता से जमने का गुण खत्म हो जाता है जिससे अनार्द्र कैल्सियम सल्फेट बनता है जिसे मृत ताप्त प्लास्टर (Dead Burnt Plaster) कहते हैं।

अन्य महत्वपूर्ण अवधारणाएँ

उदासीनिकरण अभिक्रिया (Neutralization Reaction)

वैसी रासायनिक अभिक्रिया जिसमें अम्ल एवं क्षारक अपने आयनों की अदला-बदली करके लवण एवं जल बनाते हैं, उसे उदासीनिकरण अभिक्रिया कहते हैं।

HCl + NaOH → NaCl + H₂O
(अम्ल)    (क्षारक)    (लवण)    (जल)

रवाजल (Water of Crystallization)

लवण (रवादार यौगिकों) के एक सूत्र इकाई में जल के निश्चित अणुओं की संख्या को रवाजल (क्रिस्टल का जल) कहते हैं।

सान्द्र अम्ल (Concentrated Acid)

द्रव अवस्था में उपलब्ध वह अम्ल जिसमें शुद्ध अम्ल का अनुपात अधिक और उसमें मिश्रित जल का अनुपात अत्यंत कम होता है, तो उसे सान्द्र अम्ल कहते हैं।

तनु अम्ल (Dilute Acid)

द्रव अवस्था में उपलब्ध वह अम्ल जिसमें जल की मात्रा अधिक हो, तो उसे तनु अम्ल कहते हैं।

तनुकरण (Dilution)

जल में अम्ल या क्षारक को मिलाने पर उसके आयन सांद्रता में प्रति इकाई आयतन में कमी हो जाती है तो इस प्रक्रिया को तनुकरण कहते हैं।

महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर

1. पीतल एवं ताम्बे के बर्तन में दही एवं खट्टे पदार्थ क्यों नहीं रखने चाहिए?

दही एवं खट्टे पदार्थों में अम्ल होता है। अम्ल धातुओं से अभिक्रिया कर लवण तथा H₂ गैस बनाते हैं जिससे पदार्थ खाने योग्य नहीं रहता है। साथ ही दही एवं खट्टे पदार्थों को ताँबे में रखा जाएगा तो अम्ल की क्रिया के कारण बर्तन संक्षारित हो जाएगा।

2. शुष्क HCl गैस शुष्क लिटमस पत्र का रंग क्यों नहीं बदलती है?

शुष्क HCl गैस में हाइड्रोजन आयन (H⁺) नहीं होता है। इसलिए यह अम्लीय अभिलक्षण प्रदर्शित नहीं करती है जिसके कारण लिटमस पत्र के रंग को नहीं बदलती है।

3. जल की अनुपस्थिति में अम्ल का व्यवहार अम्लीय क्यों नहीं होता है?

अम्ल केवल जल में घुलकर हीं हाइड्रोजन आयन (H⁺) उत्पन्न करते हैं। हाइड्रोजन आयन के उपस्थिति के कारण अम्लों का व्यवहार अम्लीय होता है। अतः जल की अनुपस्थिति में हाइड्रोजन आयन नहीं बनते हैं जिसके कारण अम्ल अपना अम्लीय व्यवहार नहीं करता है।

4. प्लास्टर ऑफ पेरिस को आद्र-रोधी बर्तन में क्यों रखा जाना चाहिए?

प्लास्टर ऑफ पेरिस आसानी से जल को अवशोषित कर लेता है और कठोर जिप्सम का निर्माण करता है। इसलिए प्लास्टर ऑफ पेरिस को आद्र-रोधी बर्तन में रखा जाता है नहीं तो कुछ समय के बाद इसकी पूरी मात्रा जिप्सम में बदल जाएगी।

5. आसवित जल में विद्युत का चालन क्यों नहीं होता जबकि वर्षा जल में होता है?

आसवित जल में कोई आयनिक यौगिक विलेय नहीं रहते हैं जिसके कारण ये आयनों में विघटित नहीं होते हैं। वर्षा जल वायुमंडल से होते हुए भूमि पर गिरते समय वायु के अम्लीय गैस CO₂, SO₂, NO₂ आदि को घुला लेता है जिससे विभिन्न प्रकार के अम्ल बनते हैं। ये अम्ल आयनों में विघटित होते हैं। इसलिए वर्षा जल विद्युत का चालन करते हैं।

खाद्य पदार्थों में पाए जानेवाले अम्ल

(इस विषय पर विस्तृत जानकारी आगे जोड़ी जा सकती है — जैसे: नींबू में साइट्रिक अम्ल, दही में लैक्टिक अम्ल, सिरके में एसिटिक अम्ल, आम में मैलिक अम्ल, इमली में टार्टरिक अम्ल आदि।)

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