विधुत (Electricity) - Complete Notes
🔹 विधुत धारा (Electric Current)
इसे I से सूचित किया जाता है। यह एक अदिश राशि है। इसका S.I मात्रक ऐम्पियर (A) होता है।
ऐम्पियर (Ampere)
यदि किसी चालक पदार्थ के अनुप्रस्थ-परिच्छेद से 1 सेकेण्ड में 1 कुलॉम आवेश प्रवाहित होता हैं तो उस परिच्छेद से पार करनेवाली धारा को 1 ऐम्पियर कहते हैं।
🔹 आवेश (Charge)
आवेश को प्रायः q से सूचित किया जाता है। इसका S.I मात्रक कुलॉम (C) होता है। इसका C.G.S मात्रक franklin (F) होता है।
आवेश के प्रकार
- धन आवेश (Positive Charge)
- ऋण आवेश (Negative Charge)
- किसी निकाय का आवेश न तो उत्पन्न की जा सकती है और न ही इसे नष्ट किया जा सकता है।
- असमान आवेश एक-दुसरे को आकर्षित करता हैं।
- समान आवेश एक-दुसरे को प्रतिकर्षित करता है।
- आवेश की उत्पत्ति का मुख्य कारण इलेक्ट्रॉन का स्थानांतरण है।
- 1e = 1.6 × 10-19C
- 1C = 6.25 × 1018e
- 1C = 3 × 109 e.s.u (C.G.S पद्धति)
- 1F = 9650C
🔹 कूलॉम के नियम (Laws of Coulomb)
माना कि q1 तथा q2 दो आवेश एक दुसरे से r दूरी पर स्थित है तथा उनके बीच लगने वाला बल F हैं।
कूलॉम के नियमानुसार:
F ∝ 1/r2 ...........(ii)
समीकरण (i) तथा (ii) से:
F ∝ (q1 • q2) / r2
⇒ F = k(q1 • q2) / r2
जहाँ k एक समानुपातिक नियतांक है
🔹 विभव (Potential)
इसे प्रायः V से सूचित किया जाता है। यह एक अदिश राशि है तथा इसका S.I मात्रक वोल्ट (volt) होता है।
🔹 विभवांतर (Potential Difference)
या, विधुत क्षेत्र में किन्ही दो बिन्दु के बीच के विभव के अंतर को उस विधुत क्षेत्र का विभवांतर कहते हैं। इसका S.I मात्रक वोल्ट (V) होता है।
वोल्ट (Volt)
यदि एक कूलॉम आवेश को एक बिन्दु से दूसरे बिंदु तक ले जाने में किया गया कार्य एक जूल हो तो उन दो बिन्दुओं के बीच के विभवान्तर को 1 वोल्ट कहते है।
🔹 विधुत परिपथ (Electric Circuit)
🔹 विधुतीय उपकरणों के संकेत (Symbols of Electric Components)
| उपकरण | संकेत/विवरण | उपयोग |
|---|---|---|
| ऐमीटर (Ammeter) | A | विधुत परिपथ में प्रवाहित होने वाली धारा मापी जाती है। इसे श्रेणीक्रम में जोड़ा जाता है। |
| वोल्टमीटर (Voltmeter) | V | परिपथ के किन्हीं दो बिन्दुओं के बीच का विभवांतर मापा जाता है। इसे समांतर क्रम में जोड़ा जाता हैं। |
🔹 धारा के प्रकार (Types of Current)
दिष्टधारा (Direct Current - D.C.)
प्रत्यावर्ती धारा (Alternating Current - A.C.)
🔹 चालक, अचालक, अर्द्धचालक एवं अतिचालक
1. चालक (Conductor)
उदाहरण: सोना, चाँदी, ताँबा, लोहा, एल्युमिनियम इत्यादि।
- चालक में मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या काफी अधिक होती है।
- इसकी विशिष्ट चालकता 107 Ω-1m-1 की कोटी की होती हैं।
- ताप बढ़ने पर चालकों की विशिष्ट चालकता घटती हैं।
2. अचालक (Non-conductor or Insulator)
उदाहरण: सल्फर, प्लास्टिक, रबर, काँच इत्यादि।
- अचालक पदार्थ में मुक्त इलेक्ट्रॉन नहीं होते हैं।
- इसकी विशिष्ट चालकता 10-7 Ω-1m-1 की कोटी की होती हैं।
- सेरामिक्स (बेरियम + लैनथेनियम) की विशिष्ट चालकता बहुत ही कम होती हैं।
3. अर्द्धचालक (Semi-conductor)
उदाहरण: जर्मेनियम, सिलिकॉन इत्यादि।
- इन पदार्थों में मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या अल्प (कम) होती है।
- इसकी विशिष्ट चालकता 2.5 × 10-4 से 0.25 × 10-4 Ω-1m-1 के बीच होती है।
- ताप बढ़ने पर इनकी विशिष्ट चालकता बढ़ती हैं।
- इसका उपयोग ट्रांजिस्टर, डायोड तथा कम्प्यूटर के लिए स्मरण युक्तियों के निर्माण में किया जाता हैं।
4. अतिचालक (Super Conductor)
उदाहरण: सीसा, जिंक, ऐल्युमिनियम इत्यादि।
- यह एक ऐसा न्यूनतम ताप होता है जिसपर उसका प्रतिरोध लगभग शून्य हो जाता है।
- जिस विशेष ताप के नीचे ऐसा होता हैं उसे पदार्थ का अतिचालकीय कला संक्रमण ताप कहते हैं।
🔹 प्रतिरोध (Resistance)
इसे प्राय: R से सूचित किया जाता हैं। इसका S.I मात्रक 'ओम' होता हैं जिसे ग्रीक अक्षर Ω (ओमेगा) से सूचित किया जाता है।
जहाँ, V = विभवांतर, I = विधुत धारा
ओम (Ohm)
यदि किसी चालक के दोनों सिरों पर 1 वोल्ट विभवान्तर आरोपित करके उससे 1 ऐम्पियर की धारा प्रवाहित की जाए तो उस चालक के प्रतिरोध को 1 ओम कहते हैं।
प्रतिरोध पर निर्भर करने वाले कारक
| कारक | सम्बन्ध | सूत्र |
|---|---|---|
| चालक की लम्बाई (L) | सीधा समानुपाती | R ∝ L |
| अनुप्रस्थ परिच्छेद का क्षेत्रफल (A) | व्युत्क्रमानुपाती | R ∝ 1/A |
| चालक की प्रकृति | पदार्थ पर निर्भर | भिन्न-भिन्न पदार्थों का प्रतिरोध भिन्न होता है |
| ताप | ताप बढ़ने पर प्रतिरोध बढ़ता है | प्राय: सीधा समानुपाती |
🔹 विशिष्ट प्रतिरोध या प्रतिरोधकता (Resistivity)
इसे ρ (रो) से सूचित किया जाता है। इसका S.I ओम मीटर (Ωm) होता है।
- प्रतिरोध किसी वस्तु का गुण हैं, जबकि प्रतिरोधकता उस पदार्थ का गुण है, जिससे वस्तु बना है।
- प्रतिरोधकता चालक की लम्बाई या अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल पर निर्भर नही करती हैं।
🔹 विशिष्ट चालकता (Specific Conductivity)
इसे प्राय: σ (सिग्मा) से सूचित किया जाता है। इसका S.I मात्रक प्रति ओम प्रति मीटर (Ω-1m-1) होता है।
🔹 ओम का नियम (Ohm's Law)
यदि चालक से प्रवाहित होनेवाली विधुतधारा I तथा चालक के सिरों के बीच का विभवांतर V हो तो:
⇒ V = IR (जहाँ R एक नियतांक है जिसे चालक का प्रतिरोध कहते है)
⇒ I = V / R
🔹 प्रतिरोधों का संयोजन (Combination of Resistances)
(i) श्रेणीक्रम संयोजन (Series Combination)
समतुल्य प्रतिरोध:
माना कि R1, R2 तथा R3 तीन प्रतिरोध को श्रेणीक्रम में जुड़े है। इन सभी प्रतिरोधो से एक समान धारा I प्रवाहित होती हैं।
V = IR
⇒ IR = V1 + V2 + V3
⇒ IR = IR1 + IR2 + IR3
⇒ Rs = R1 + R2 + R3
- श्रेणीक्रम में संयोजित अनेक प्रतिरोधों के समतुल्य प्रतिरोध का मान प्रत्येक प्रतिरोध से बड़ा होता है।
- यदि समान मान r के n प्रतिरोध श्रेणीक्रम में संयोजित हो तो उनका समतुल्य प्रतिरोध: RS = nr
(ii) समांतरक्रम संयोजन (Parallel Combination)
समतुल्य प्रतिरोध:
माना R1, R2 तथा R3 तीन प्रतिरोध को समांतरक्रम में जोड़ा गया है। बैट्री से प्रवाहित होनेवाली कुल धारा I है जो बिन्दु A पर तीन भागों में क्रमश: I1, I2 और I3 में बट जाती हैं।
V = IR
⇒ V/R = I1 + I2 + I3
⇒ V/R = V/R1 + V/R2 + V/R3
⇒ 1/RP = 1/R1 + 1/R2 + 1/R3
- समांतरक्रम में संयोजित प्रतिरोधों का समतुल्य प्रतिरोध का मान प्रत्येक प्रतिरोध से छोटा हैं।
- यदि समान मान r के n प्रतिरोध समांतर क्रम में संयोजित हों तो उनका समतुल्य प्रतिरोध: RP = r/n
🔹 विधुत धारा का उष्मीय प्रभाव (Heating Effect of Electric Current)
सूत्र का निगमन (Derivation)
किसी विधुत परिपथ में किन्ही दो बिन्दुओं के बीच विभवांतर इकाई आवेश को एक बिन्दु से दुसरे बिन्दु तक लाने में किया गया कार्य होता है।
हम जानते है की:
I = Q/t ⇒ Q = It
समीकरण (1) से:
W = V.It
⇒ W = IR.It (∵ V = IR)
⇒ W = I2Rt
यदि किया गया सम्पूर्ण कार्य ऊष्मा H के रूप में परिवर्तन हो तो:
H = I2Rt
जूल के उष्मीय प्रभाव के नियम
- किसी चालक तार में उत्पन्न ऊष्मा उसमें प्रवाहित होनेवाली धारा के वर्ग के समानुपाती होती हैं।
H ∝ I2 (जहाँ R एवं t अचर हो) - किसी चालक तार में उत्पन्न उष्मा चालक के प्रतिरोध के समानुपाती होती हैं।
H ∝ R (जहाँ I एवं t अचर हो) - किसी चालक तार में उत्पन्न उष्मा धारा प्रवाह के समय के समानुपाती होती हैं।
H ∝ t (जहाँ I एवं R अचर हो)
🔹 विधुत शक्ति (Electric Power)
इसे P से सूचित किया जाता है तथा इसका S.I मात्रक वाट (W) है।
⇒ P = I2RT/t (∵ W = I2RT)
⇒ P = I2R
पुनः हम जानते है कि:
W = VQ ⇒ W = VIT (∵ Q = IT)
∴ P = VIT/t ⇒ P = VI
⇒ P = V × V/R (∵ I = V/R)
⇒ P = V2/R
वाट (Watt)
1 जूल प्रति सेकेण्ड कार्य करने की दर को 1 वाट कहते है।
- 1 KW = 103 W
- 1 MW = 106 W
- 1 H.P = 746 W
🔹 विधुत ऊर्जा (Electric Energy)
B.O.T यूनिट (Board of Trade Unit)
B.O.T यूनिट का पूरा नाम Board of Trade Unit है। घर में लगे बिजली के मीटरों से बिजली के उपभोग का पाठ्यांक (Reading) B.O.T यूनिट में ही प्राप्त होता हैं। इसे एक यूनिट भी कहते हैं।
= 1 KWh
= 1000 × 60 × 60 Ws
= 3.6 × 106 J
🔹 विधुतीय उपकरण (Electric Devices)
1. विधुत बल्ब (Electric Bulb)
2. विधुत हीटर (Electric Heater)
3. विधुत इस्तरी (Electric Iron)
4. विधुत विकिरण (Electric Radiator)
5. विधुत फ्यूज (Electric Fuse)
6. फ्यूज की क्षमता (Power of Fuse)
7. अतिभारण (Over Loading)
8. लघुपथन (Short Circuit)
🔹 महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर (Important Q&A)
विधुत बल्ब में टंगस्टन तार का उपयोग क्यों होता है?
उत्तर: टंगस्टन तार का प्रतिरोध तथा गलनांक काफी उच्च होता है। उच्च प्रतिरोध होने से फिलामेंट (तंतु) से अधिक प्रकाश उत्पन्न होता है। अतः विधुत बल्ब में टंगस्टन तार का उपयोग होता है।
विधुत बल्ब में निष्क्रीय गैस क्यों भरी जाती हैं?
उत्तर: विधुत बल्ब में टंगस्टन का फिलामेंट रहता है। यदि फिलामेंट से हवा की उपस्थिति में धारा प्रवाहित करायी जाए तो वह ऑक्सीकृत होने लगती है एवं भंगुर होकर जल जाता है। इसलिए काँच के बल्ब के अंदर से हवा निकालकर उसमें निष्क्रीय गैस भर दिया जाता है जिससे बल्ब का फिलामेंट सुरक्षित रहता है।
नाइक्रोम तार की विधुत ताप उपकरणों में क्या उपयोगिता हैं?
उत्तर: बहुत से विधुत ताप उपकरणों में नाइक्रोम के तार की कुण्डली का उपयोग होता हैं। नाइक्रोम निकेल, क्रोमियम तथा लोहे से बनी एक मिश्रधातु है इसका प्रतिरोध और ग्लानांक बहुत उच्च होता है। इसमें प्रबल धारा प्रवाहित होने पर भी यह नहीं गलती हैं।
किसी तार में धारा प्रवाहित करने पर उसमें उष्मा क्यों उत्पन्न होती है?
उत्तर: जब किसी तार में धारा उत्पन्न करने के लिए इलेक्ट्रॉन तार में प्रवाहित होते है तो ऊर्जा की हानि होती है। इलेक्ट्रॉन जब चालक के विधुत क्षेत्र के अधीन चलते है तो वे ऊर्जा प्राप्त करते है। यह खोई गई ऊर्जा तार में उष्मा के रूप में उत्पन्न होती है। अत: तार गर्म हो जाता है, यदि उसमें बड़ी धारा प्रवाहित हो रही है।
घरों में बल्बों को समांतर क्रम में क्यों जोड़ा जाता हैं?
उत्तर: यदि घरों में बल्ब समांतर क्रम में न जोड़कर श्रेणी क्रम में जोड़ा जाए तो किसी एक बल्ब के खराब या तंतु (फिलामेंट) के टूटने पर सभी बल्बों से धारा का प्रवाह बंद हो जाएगा और सभी बल्ब एक साथ बंद हो जाएँगे।
विधुत परिपथ में सुरक्षा की युक्तियों का वर्णन करें?
उत्तर: विधुत परिपथ में सुरक्षा के निम्नलिखित उपाय है:
- विधुत परिपथ के सभी तार विधुतरोधी पदार्थों से लिपटा होना चाहिए।
- आग लगने या दुर्घटना होने पर परिपथ के स्विच बंद कर देना चाहिए।
- स्विचों तथा अन्य जोड़ों पर संयोजन, कसा (tight) होना चाहिए।
- उपयुक्त क्षमता वाली फ्यूज का उपयोग करना चाहिए साथ ही फ्यूज उपयुक्त पदार्थ का बना होना चाहिए।
- जब कभी परिपथ के किसी भाग पर मरम्मत का कार्य करना हो तो रबड़ के बने दस्ताने तथा जूते का उपयोग करना चाहिए।
- अगर किसी व्यक्ति का सम्पर्क विद्युत तार से हो जाता है तो उन व्यक्ति को अचालक पदार्थ का आधार लेकर छुड़ाना चाहिए।
विधुत टोस्टरों तथा विधुत इस्तरियों के तपन अवयव शुद्ध धातु के न बना कर किसी मिश्रधातु के क्यों बनाए जाते हैं?
उत्तर: विधुत टेस्टरों एवं विधुत इस्तरियों के तपन अवयव नाइक्रोम के होता है। यह एक मिश्रधातु है। तपन अवयव मिश्रधातु के बनाये जाने के निम्नलिखित कारण है:
- मिश्रधातु की प्रतिरोधकता प्राय: उसके अवयवी धातु से अधिक होता है।
- इस मिश्रधातु का गलनांक अधिक होता है।
- यह लाल तप्त होने पर भी आक्सीकृत नहीं होता हैं।
श्रेणीक्रम में संयोजित करने के स्थान पर वैधुत युक्तियों को पार्श्वक्रम में बैट्री से संयोजित करने से क्या लाभ हैं?
उत्तर: जब अनेक युक्तियों को पार्श्वक्रम संयोजन किया जाता है तो प्रत्येक युक्ति समान विभवांतर प्राप्त कर लेते है। इसलिए यदि कभी एक युक्ति बंद या खराब भी हो जाती है तो अन्य युक्ति कार्य करती रहती हैं। लेकिन यदि उन सभी युक्तियों को श्रेणीक्रम संयोजन में संयोजित किया जाए तो सभी युक्तियाँ एक समान धारा प्राप्त कर लेती है। यदि एक भी युक्ति कार्य करना बंद कर देता है तो परिपथ ही बंद हो जाता है एवं सभी युक्तियाँ कार्य करना बंद कर देती है। अतः समांतरक्रम संयोजन में संयोजित करना लाभप्रद है।