विधुत (Electricity) Class 10 Physics – Bihar Board Complete Notes + Important Questions

विधुत (Electricity) - Complete Notes

विधुत (Electricity) - Complete Notes

🔹 विधुत धारा (Electric Current)

परिभाषा: किसी चालक में प्रवाहित होनेवाले आवेशों के प्रवाह के दर को विधुत धारा कहते हैं।

इसे I से सूचित किया जाता है। यह एक अदिश राशि है। इसका S.I मात्रक ऐम्पियर (A) होता है।

विधुत धारा = आवेश / समय   ⇒   I = Q / t

ऐम्पियर (Ampere)

यदि किसी चालक पदार्थ के अनुप्रस्थ-परिच्छेद से 1 सेकेण्ड में 1 कुलॉम आवेश प्रवाहित होता हैं तो उस परिच्छेद से पार करनेवाली धारा को 1 ऐम्पियर कहते हैं।

1A = 1C / 1S

🔹 आवेश (Charge)

परिभाषा: विधुत आवेश किसी भी पदार्थ का मूल गुण होती है जिसके कारण पदार्थ में विधुत क्षेत्र उत्पन्न होती है।

आवेश को प्रायः q से सूचित किया जाता है। इसका S.I मात्रक कुलॉम (C) होता है। इसका C.G.S मात्रक franklin (F) होता है।

q = ne

आवेश के प्रकार

  1. धन आवेश (Positive Charge)
  2. ऋण आवेश (Negative Charge)
  • किसी निकाय का आवेश न तो उत्पन्न की जा सकती है और न ही इसे नष्ट किया जा सकता है।
  • असमान आवेश एक-दुसरे को आकर्षित करता हैं।
  • समान आवेश एक-दुसरे को प्रतिकर्षित करता है।
  • आवेश की उत्पत्ति का मुख्य कारण इलेक्ट्रॉन का स्थानांतरण है।
  • 1e = 1.6 × 10-19C
  • 1C = 6.25 × 1018e
  • 1C = 3 × 109 e.s.u (C.G.S पद्धति)
  • 1F = 9650C

🔹 कूलॉम के नियम (Laws of Coulomb)

नियम: दो आवेशो के बीच क्रियाशील आकर्षण या प्रतिकर्षण बल उन आवेशो के परिमाणों के गुणनफल के समानुपाती तथा उन दोनों आवेशों के बीच की दूरी के वर्ग का व्युत्क्रमानुपाती होता हैं।

माना कि q1 तथा q2 दो आवेश एक दुसरे से r दूरी पर स्थित है तथा उनके बीच लगने वाला बल F हैं।

कूलॉम के नियमानुसार:

F ∝ q1 • q2 ...........(i)
F ∝ 1/r2 ...........(ii)

समीकरण (i) तथा (ii) से:
F ∝ (q1 • q2) / r2

⇒ F = k(q1 • q2) / r2
जहाँ k एक समानुपातिक नियतांक है

🔹 विभव (Potential)

परिभाषा: इकाई धन आवेश को अनंत से विधुतीय क्षेत्र के किसी एक बिन्दु तक लाने में किए गए कार्य की मात्रा को उस बिन्दु पर का विधुतीय विभव कहते है।

इसे प्रायः V से सूचित किया जाता है। यह एक अदिश राशि है तथा इसका S.I मात्रक वोल्ट (volt) होता है।

पृथ्वी पर का विभव शून्य माना जाता है।

🔹 विभवांतर (Potential Difference)

परिभाषा: इकाई धन आवेश को विधुतीय क्षेत्र के किसी एक बिन्दु से दुसरे बिन्दु तक ले जाने में किए गए कार्य की मात्रा को विभवांतर कहते हैं।

या, विधुत क्षेत्र में किन्ही दो बिन्दु के बीच के विभव के अंतर को उस विधुत क्षेत्र का विभवांतर कहते हैं। इसका S.I मात्रक वोल्ट (V) होता है।

विभवांतर = कार्य / आवेश   ⇒   V = W/Q   ⇒   W = VQ

वोल्ट (Volt)

यदि एक कूलॉम आवेश को एक बिन्दु से दूसरे बिंदु तक ले जाने में किया गया कार्य एक जूल हो तो उन दो बिन्दुओं के बीच के विभवान्तर को 1 वोल्ट कहते है।

1V = 1J / 1C

🔹 विधुत परिपथ (Electric Circuit)

परिभाषा: कोई ऐसी व्यवस्था जिससे लगातार विधुत धारा प्राप्त होती है, उसे विधुत परिपथ कहते हैं।
Electric Circuit Symbols
चित्र 1: विधुतीय परिपथ के प्रमुख संकेत (Symbols)

🔹 विधुतीय उपकरणों के संकेत (Symbols of Electric Components)

उपकरण संकेत/विवरण उपयोग
ऐमीटर (Ammeter) A विधुत परिपथ में प्रवाहित होने वाली धारा मापी जाती है। इसे श्रेणीक्रम में जोड़ा जाता है।
वोल्टमीटर (Voltmeter) V परिपथ के किन्हीं दो बिन्दुओं के बीच का विभवांतर मापा जाता है। इसे समांतर क्रम में जोड़ा जाता हैं।

🔹 धारा के प्रकार (Types of Current)

दिष्टधारा (Direct Current - D.C.)

जब किसी परिपथ में धारा हमेशा एक ही दिशा में प्रवाहित होती है तो उस धारा को दिष्टधारा कहते है। इसे संक्षेप में D.C. कहते है।

प्रत्यावर्ती धारा (Alternating Current - A.C.)

जब किसी परिपथ में खास समय तक एक दिशा में और उतने ही समय तक विपरीत दिशा में बारी-बारी से प्रवाहित होती है, तो ऐसी धारा को प्रत्यावर्ती धारा कहते है। इसे संक्षेप में A.C. कहते है।
विधुत धारा में लगातार परिवर्तन होता रहता है।

🔹 चालक, अचालक, अर्द्धचालक एवं अतिचालक

1. चालक (Conductor)

ऐसा पदार्थ जिनसे होकर विधुत आवेश एक जगह से दूसरी जगह आसानी से चले जाते हैं, तो उसे चालक कहते है।

उदाहरण: सोना, चाँदी, ताँबा, लोहा, एल्युमिनियम इत्यादि।

  • चालक में मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या काफी अधिक होती है।
  • इसकी विशिष्ट चालकता 107 Ω-1m-1 की कोटी की होती हैं।
  • ताप बढ़ने पर चालकों की विशिष्ट चालकता घटती हैं।

2. अचालक (Non-conductor or Insulator)

ऐसा पदार्थ जिनसे होकर विधुत आवेश प्रवाहित नहीं हो सकता हैं, तो उसे अचालक कहते हैं।

उदाहरण: सल्फर, प्लास्टिक, रबर, काँच इत्यादि।

  • अचालक पदार्थ में मुक्त इलेक्ट्रॉन नहीं होते हैं।
  • इसकी विशिष्ट चालकता 10-7 Ω-1m-1 की कोटी की होती हैं।
  • सेरामिक्स (बेरियम + लैनथेनियम) की विशिष्ट चालकता बहुत ही कम होती हैं।

3. अर्द्धचालक (Semi-conductor)

ऐसा पदार्थ जिनकी विशिष्ट चालकता चालक तथा अचालक पदार्थों की विशिष्ट चालकताओं के बीच होती हैं, तो उसे अर्द्धचालक कहते हैं।

उदाहरण: जर्मेनियम, सिलिकॉन इत्यादि।

  • इन पदार्थों में मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या अल्प (कम) होती है।
  • इसकी विशिष्ट चालकता 2.5 × 10-4 से 0.25 × 10-4 Ω-1m-1 के बीच होती है।
  • ताप बढ़ने पर इनकी विशिष्ट चालकता बढ़ती हैं।
  • इसका उपयोग ट्रांजिस्टर, डायोड तथा कम्प्यूटर के लिए स्मरण युक्तियों के निर्माण में किया जाता हैं।

4. अतिचालक (Super Conductor)

ऐसा पदार्थ जिनमें अति निम्न ताप पर बिना किसी प्रतिरोध के विधुत गमन होता हैं, तो उसे अतिचालक कहते हैं।

उदाहरण: सीसा, जिंक, ऐल्युमिनियम इत्यादि।

  • यह एक ऐसा न्यूनतम ताप होता है जिसपर उसका प्रतिरोध लगभग शून्य हो जाता है।
  • जिस विशेष ताप के नीचे ऐसा होता हैं उसे पदार्थ का अतिचालकीय कला संक्रमण ताप कहते हैं।

🔹 प्रतिरोध (Resistance)

परिभाषा: किसी चालक में इलेक्ट्रॉन के प्रवाह में किसी पदार्थ के अणुओं द्वारा जो रुकावट उत्पन्न होती है, तो उसे उस पदार्थ का प्रतिरोध कहते हैं।

इसे प्राय: R से सूचित किया जाता हैं। इसका S.I मात्रक 'ओम' होता हैं जिसे ग्रीक अक्षर Ω (ओमेगा) से सूचित किया जाता है।

R = V / I
जहाँ, V = विभवांतर, I = विधुत धारा

ओम (Ohm)

यदि किसी चालक के दोनों सिरों पर 1 वोल्ट विभवान्तर आरोपित करके उससे 1 ऐम्पियर की धारा प्रवाहित की जाए तो उस चालक के प्रतिरोध को 1 ओम कहते हैं।

1Ω = 1V / 1A

प्रतिरोध पर निर्भर करने वाले कारक

कारक सम्बन्ध सूत्र
चालक की लम्बाई (L) सीधा समानुपाती R ∝ L
अनुप्रस्थ परिच्छेद का क्षेत्रफल (A) व्युत्क्रमानुपाती R ∝ 1/A
चालक की प्रकृति पदार्थ पर निर्भर भिन्न-भिन्न पदार्थों का प्रतिरोध भिन्न होता है
ताप ताप बढ़ने पर प्रतिरोध बढ़ता है प्राय: सीधा समानुपाती

🔹 विशिष्ट प्रतिरोध या प्रतिरोधकता (Resistivity)

परिभाषा: चालक पदार्थ के इकाई अनुप्रस्थ परिच्छेद वाले इकाई लम्बाई के खण्ड के प्रतिरोध को उसका विशिष्ट प्रतिरोध या प्रतिरोधकता कहते हैं।

इसे ρ (रो) से सूचित किया जाता है। इसका S.I ओम मीटर (Ωm) होता है।

ρ = R × (A / l)
  • प्रतिरोध किसी वस्तु का गुण हैं, जबकि प्रतिरोधकता उस पदार्थ का गुण है, जिससे वस्तु बना है।
  • प्रतिरोधकता चालक की लम्बाई या अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल पर निर्भर नही करती हैं।

🔹 विशिष्ट चालकता (Specific Conductivity)

परिभाषा: विशिष्ट प्रतिरोध के प्रतिलोम को विशिष्ट चालकता कहते है।

इसे प्राय: σ (सिग्मा) से सूचित किया जाता है। इसका S.I मात्रक प्रति ओम प्रति मीटर (Ω-1m-1) होता है।

σ = 1 / ρ

🔹 ओम का नियम (Ohm's Law)

नियम: अचर ताप पर किसी चालक से प्रवाहित होनेवाली विधुतधारा चालक के सिरों के बीच के विभवांतर का सीधा समानुपाती होता हैं।

यदि चालक से प्रवाहित होनेवाली विधुतधारा I तथा चालक के सिरों के बीच का विभवांतर V हो तो:

V ∝ I   (जहाँ ताप अचर हो)
⇒ V = IR   (जहाँ R एक नियतांक है जिसे चालक का प्रतिरोध कहते है)
⇒ I = V / R
विधुतधारा, विभवांतर का सीधा समानुपाती तथा प्रतिरोध का व्युत्क्रमानुपाती होता हैं।

🔹 प्रतिरोधों का संयोजन (Combination of Resistances)

(i) श्रेणीक्रम संयोजन (Series Combination)

यदि किसी प्रतिरोध का संयोजन इसप्रकार किया गया हो कि पहले प्रतिरोध का दूसरा सिरा, दूसरे प्रतिरोध के पहला सिरा से एवं दूसरे प्रतिरोध का दूसरा सिरा, तीसरे प्रतिरोध के पहला सिरा से जोड़ा गया हो तो इसप्रकार के संयोजन को श्रेणीक्रम संयोजन कहते हैं।
Series and Parallel Combination
चित्र 2: (a) श्रेणीक्रम संयोजन (b) समांतरक्रम संयोजन

समतुल्य प्रतिरोध:

माना कि R1, R2 तथा R3 तीन प्रतिरोध को श्रेणीक्रम में जुड़े है। इन सभी प्रतिरोधो से एक समान धारा I प्रवाहित होती हैं।

ओम के नियमानुसार:
V = IR
⇒ IR = V1 + V2 + V3
⇒ IR = IR1 + IR2 + IR3
⇒ Rs = R1 + R2 + R3
  • श्रेणीक्रम में संयोजित अनेक प्रतिरोधों के समतुल्य प्रतिरोध का मान प्रत्येक प्रतिरोध से बड़ा होता है।
  • यदि समान मान r के n प्रतिरोध श्रेणीक्रम में संयोजित हो तो उनका समतुल्य प्रतिरोध: RS = nr

(ii) समांतरक्रम संयोजन (Parallel Combination)

यदि किसी प्रतिरोध का संयोजन इसप्रकार किया गया हो कि सभी प्रतिरोध का पहला सिरा एक बिन्दु पर तथा सभी प्रतिरोध का दूसरा सिरा एक बिन्दु पर जोड़ा गया हो तो इसप्रकार के संयोजन को समांतरक्रम संयोजन कहते हैं। इसे पार्श्वबद्ध संयोजन भी कहते हैं।

समतुल्य प्रतिरोध:

माना R1, R2 तथा R3 तीन प्रतिरोध को समांतरक्रम में जोड़ा गया है। बैट्री से प्रवाहित होनेवाली कुल धारा I है जो बिन्दु A पर तीन भागों में क्रमश: I1, I2 और I3 में बट जाती हैं।

ओम के नियमानुसार:
V = IR
⇒ V/R = I1 + I2 + I3
⇒ V/R = V/R1 + V/R2 + V/R3
1/RP = 1/R1 + 1/R2 + 1/R3
  • समांतरक्रम में संयोजित प्रतिरोधों का समतुल्य प्रतिरोध का मान प्रत्येक प्रतिरोध से छोटा हैं।
  • यदि समान मान r के n प्रतिरोध समांतर क्रम में संयोजित हों तो उनका समतुल्य प्रतिरोध: RP = r/n

🔹 विधुत धारा का उष्मीय प्रभाव (Heating Effect of Electric Current)

सूत्र का निगमन (Derivation)

किसी विधुत परिपथ में किन्ही दो बिन्दुओं के बीच विभवांतर इकाई आवेश को एक बिन्दु से दुसरे बिन्दु तक लाने में किया गया कार्य होता है।

V = W/Q ⇒ W = VQ ...........(i)

हम जानते है की:
I = Q/t ⇒ Q = It

समीकरण (1) से:
W = V.It
⇒ W = IR.It   (∵ V = IR)
⇒ W = I2Rt

यदि किया गया सम्पूर्ण कार्य ऊष्मा H के रूप में परिवर्तन हो तो:
H = I2Rt
1 Cal = 4.2 J

जूल के उष्मीय प्रभाव के नियम

  1. किसी चालक तार में उत्पन्न ऊष्मा उसमें प्रवाहित होनेवाली धारा के वर्ग के समानुपाती होती हैं।
    H ∝ I2 (जहाँ R एवं t अचर हो)
  2. किसी चालक तार में उत्पन्न उष्मा चालक के प्रतिरोध के समानुपाती होती हैं।
    H ∝ R (जहाँ I एवं t अचर हो)
  3. किसी चालक तार में उत्पन्न उष्मा धारा प्रवाह के समय के समानुपाती होती हैं।
    H ∝ t (जहाँ I एवं R अचर हो)

🔹 विधुत शक्ति (Electric Power)

परिभाषा: एक सेकेण्ड में किसी विधुतीय उपकरण द्वारा उपयुक्त विधुत ऊर्जा को उस उपकरण का विधुत शक्ति कहते है।

इसे P से सूचित किया जाता है तथा इसका S.I मात्रक वाट (W) है।

P = W/t
⇒ P = I2RT/t   (∵ W = I2RT)
P = I2R

पुनः हम जानते है कि:
W = VQ ⇒ W = VIT   (∵ Q = IT)
∴ P = VIT/t ⇒ P = VI
⇒ P = V × V/R   (∵ I = V/R)
P = V2/R

वाट (Watt)

1 जूल प्रति सेकेण्ड कार्य करने की दर को 1 वाट कहते है।

1W = 1J / 1S
  • 1 KW = 103 W
  • 1 MW = 106 W
  • 1 H.P = 746 W

🔹 विधुत ऊर्जा (Electric Energy)

परिभाषा: किसी विधुतीय उपकरण द्वारा जो विधुत का उपयोग किया जाता है उसे उस उपकरण का विधुत ऊर्जा कहते हैं। इसका S.I मात्रक जूल (J) होता हैं।

B.O.T यूनिट (Board of Trade Unit)

B.O.T यूनिट का पूरा नाम Board of Trade Unit है। घर में लगे बिजली के मीटरों से बिजली के उपभोग का पाठ्यांक (Reading) B.O.T यूनिट में ही प्राप्त होता हैं। इसे एक यूनिट भी कहते हैं।

1 B.O.T unit = 1 unit
= 1 KWh
= 1000 × 60 × 60 Ws
= 3.6 × 106 J
किलोवाट घंटा (Kwh) विधुत ऊर्जा का व्यवसायिक मात्रक है।

🔹 विधुतीय उपकरण (Electric Devices)

1. विधुत बल्ब (Electric Bulb)

विधुत बल्बों में टंगस्टन के बारीक एवं सर्वत्र समान व्यास के ऐठी हुई कुडली होती है जिसे फिलामेंट (तंतु) कहते है। फिलामेंट काँच के दीवार वाले बल्ब के भीतर व्यवस्थित रहती है। जिसके भीतर हवा निकालकर निष्क्रीय गैस भरी रहती है।
Electric Bulb Filament
चित्र 3: विधुत बल्ब का फिलामेंट

2. विधुत हीटर (Electric Heater)

विधुत हीटर में चीनी मिट्टी का एक वर्तन होता हैं जिसमें वक्राकार खाँचे बने रहती है। इस खाँचे में नाइक्रोम के तार की सर्पिल कुण्डली लगी रहती है। जब इसमें धारा प्रवाहित होती है तब यह गर्म होकर लाल हो जाता है और उष्मा उत्पन्न करने लगता है।
Nichrome Wire Heater
चित्र 4: नाइक्रोम तार की कुण्डली

3. विधुत इस्तरी (Electric Iron)

विधुत इस्तरी अभ्रक की पत्ती पर नाइक्रोम का तार लपेटा रहता है। इस पत्ती को अभ्रक की दो पत्तियों द्वारा उपर-नीचे ढँक दिया जाता है। तार से जब धारा प्रवाहित की जाती है तब यह गर्म होकर लोहे की प्लेट को गर्म करती है।

4. विधुत विकिरण (Electric Radiator)

विधुत विकिरण जाड़े के दिनों में कमरे को गर्म रखने के लिए किया जाता हैं। इसमें चीनी मिट्टी के पतले बेलन पर नाइक्रोम तार की कुंडली को लपेट दिया जाता है।

5. विधुत फ्यूज (Electric Fuse)

विधुत फ्यूज सुरक्षा की एक युक्ति है जो ताँबे तथा टिन का मिश्रधातु है। विधुत परिपथ में अचानक किसी कारण धारा का प्रवलय बढ़ जाए तो सबसे पहले गर्म होकर फ्यूज का तार गल जाता है जिससे उसमे लगे बल्ब, पंखे, हीटर इत्यादि जलने से बच जाता है।

6. फ्यूज की क्षमता (Power of Fuse)

विधुत धारा की प्रबलता के जिस मान पर पहुंचते ही फ्यूज गल जाता है, उसे फ्यूज की क्षमता कहते है।

7. अतिभारण (Over Loading)

यदि किसी विधुत परिपथ में अधिक शक्ति वाली उपकरणों को स्रोत से जोड़ दिया जाए तो परिपथ से प्रबल धारा प्रवाहित होने लगती है जिससे वह गर्म हो जाता है। परिपथ की धारा को इस प्रकार बढ़ने की घटना को परिपथ का अतिभारण कहते हैं।

8. लघुपथन (Short Circuit)

कभी-कभी ऐसा होता है कि मुख्य आपूर्ति लाईन से जुड़े गर्म तथा ठंडा तार आपस में सट जाते है जिससे परिपथ का प्रतिरोध लगभग शून्य हो जाते है तथा धारा की प्रबलता काफी बढ जाती है। परिपथ में इस प्रकार धारा के बढ़ने की घटना को लघुपथन कहते हैं।
Series Parallel Circuit
चित्र 5: विधुत परिपथ में श्रेणी-समांतर संयोजन

🔹 महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर (Important Q&A)

विधुत बल्ब में टंगस्टन तार का उपयोग क्यों होता है?

उत्तर: टंगस्टन तार का प्रतिरोध तथा गलनांक काफी उच्च होता है। उच्च प्रतिरोध होने से फिलामेंट (तंतु) से अधिक प्रकाश उत्पन्न होता है। अतः विधुत बल्ब में टंगस्टन तार का उपयोग होता है।

विधुत बल्ब में निष्क्रीय गैस क्यों भरी जाती हैं?

उत्तर: विधुत बल्ब में टंगस्टन का फिलामेंट रहता है। यदि फिलामेंट से हवा की उपस्थिति में धारा प्रवाहित करायी जाए तो वह ऑक्सीकृत होने लगती है एवं भंगुर होकर जल जाता है। इसलिए काँच के बल्ब के अंदर से हवा निकालकर उसमें निष्क्रीय गैस भर दिया जाता है जिससे बल्ब का फिलामेंट सुरक्षित रहता है।

नाइक्रोम तार की विधुत ताप उपकरणों में क्या उपयोगिता हैं?

उत्तर: बहुत से विधुत ताप उपकरणों में नाइक्रोम के तार की कुण्डली का उपयोग होता हैं। नाइक्रोम निकेल, क्रोमियम तथा लोहे से बनी एक मिश्रधातु है इसका प्रतिरोध और ग्लानांक बहुत उच्च होता है। इसमें प्रबल धारा प्रवाहित होने पर भी यह नहीं गलती हैं।

किसी तार में धारा प्रवाहित करने पर उसमें उष्मा क्यों उत्पन्न होती है?

उत्तर: जब किसी तार में धारा उत्पन्न करने के लिए इलेक्ट्रॉन तार में प्रवाहित होते है तो ऊर्जा की हानि होती है। इलेक्ट्रॉन जब चालक के विधुत क्षेत्र के अधीन चलते है तो वे ऊर्जा प्राप्त करते है। यह खोई गई ऊर्जा तार में उष्मा के रूप में उत्पन्न होती है। अत: तार गर्म हो जाता है, यदि उसमें बड़ी धारा प्रवाहित हो रही है।

घरों में बल्बों को समांतर क्रम में क्यों जोड़ा जाता हैं?

उत्तर: यदि घरों में बल्ब समांतर क्रम में न जोड़कर श्रेणी क्रम में जोड़ा जाए तो किसी एक बल्ब के खराब या तंतु (फिलामेंट) के टूटने पर सभी बल्बों से धारा का प्रवाह बंद हो जाएगा और सभी बल्ब एक साथ बंद हो जाएँगे।

विधुत परिपथ में सुरक्षा की युक्तियों का वर्णन करें?

उत्तर: विधुत परिपथ में सुरक्षा के निम्नलिखित उपाय है:

  • विधुत परिपथ के सभी तार विधुतरोधी पदार्थों से लिपटा होना चाहिए।
  • आग लगने या दुर्घटना होने पर परिपथ के स्विच बंद कर देना चाहिए।
  • स्विचों तथा अन्य जोड़ों पर संयोजन, कसा (tight) होना चाहिए।
  • उपयुक्त क्षमता वाली फ्यूज का उपयोग करना चाहिए साथ ही फ्यूज उपयुक्त पदार्थ का बना होना चाहिए।
  • जब कभी परिपथ के किसी भाग पर मरम्मत का कार्य करना हो तो रबड़ के बने दस्ताने तथा जूते का उपयोग करना चाहिए।
  • अगर किसी व्यक्ति का सम्पर्क विद्युत तार से हो जाता है तो उन व्यक्ति को अचालक पदार्थ का आधार लेकर छुड़ाना चाहिए।

विधुत टोस्टरों तथा विधुत इस्तरियों के तपन अवयव शुद्ध धातु के न बना कर किसी मिश्रधातु के क्यों बनाए जाते हैं?

उत्तर: विधुत टेस्टरों एवं विधुत इस्तरियों के तपन अवयव नाइक्रोम के होता है। यह एक मिश्रधातु है। तपन अवयव मिश्रधातु के बनाये जाने के निम्नलिखित कारण है:

  • मिश्रधातु की प्रतिरोधकता प्राय: उसके अवयवी धातु से अधिक होता है।
  • इस मिश्रधातु का गलनांक अधिक होता है।
  • यह लाल तप्त होने पर भी आक्सीकृत नहीं होता हैं।

श्रेणीक्रम में संयोजित करने के स्थान पर वैधुत युक्तियों को पार्श्वक्रम में बैट्री से संयोजित करने से क्या लाभ हैं?

उत्तर: जब अनेक युक्तियों को पार्श्वक्रम संयोजन किया जाता है तो प्रत्येक युक्ति समान विभवांतर प्राप्त कर लेते है। इसलिए यदि कभी एक युक्ति बंद या खराब भी हो जाती है तो अन्य युक्ति कार्य करती रहती हैं। लेकिन यदि उन सभी युक्तियों को श्रेणीक्रम संयोजन में संयोजित किया जाए तो सभी युक्तियाँ एक समान धारा प्राप्त कर लेती है। यदि एक भी युक्ति कार्य करना बंद कर देता है तो परिपथ ही बंद हो जाता है एवं सभी युक्तियाँ कार्य करना बंद कर देती है। अतः समांतरक्रम संयोजन में संयोजित करना लाभप्रद है।

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