विधुत धारा के चुम्बकीय प्रभाव
Magnetic Effect of Electric Current
चुंबक (Magnet)
ऐसा पदार्थ जो लोहा, इस्पात, निकेल, कोबाल्ट के टुकड़े को अपनी ओर आकर्षित करता है, तो उसे चुंबक कहते हैं।
चुंबकीय ध्रुव (Magnetic Pole)
चुंबक के दोनों सिरों पर दो ऐसे बिंदु होते हैं जिनपर चुंबक की आकर्षण शक्ति अधिक होती है जिसे चुंबकीय ध्रुव कहते हैं।
चुंबक के दो ध्रुव होते हैं:
• उत्तरी ध्रुव (North Pole)
• दक्षिणी ध्रुव (South Pole)
• उत्तरी ध्रुव (North Pole)
• दक्षिणी ध्रुव (South Pole)
चुंबक के मुख्य गुण (Properties of magnet)
- चुंबक चुंबकीय पदार्थ को अपनी ओर आकर्षित करता हैं।
- चुंबक को स्वतंत्रपूर्वक लटकाने पर यह हमेशा उत्तर-दक्षिण में ही रुकता हैं।
- चुंबक के सजातीय ध्रुवों के बीच विकर्षण तथा विजातीय ध्रुवों के बीच आकर्षण होता है।
चुंबकीय बल (Magnetic force): चुंबक जिस बल से किसी चुंबकीय पदार्थ को आकर्षित या विकर्षित करता है, उसे चुंबकीय बल कहते हैं।
चुंबकीय क्षेत्र (Magnetic field): किसी चुंबक के चारों ओर का वह क्षेत्र जिसमें उसके चुंबकीय बल का अनुभव किया जाता है, उसे उस चुंबक का चुंबकीय क्षेत्र कहते हैं।
चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ (Magnetic field Lines): किसी चुंबक या चुंबकीय स्रोत के चारों ओर वे रेखाएँ जिनकी प्रत्येक बिंदु पर स्पर्श रेखा की दिशा में चुंबकीय क्षेत्र की दिशा निरूपित होती हैं, उसे चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ कहते हैं।
या,
चुंबकीय क्षेत्र रेखा चुंबकीय क्षेत्र में स्थित ऐसे वक्र पथ हैं जो चुंबकीय क्षेत्र की दिशा को प्रदर्शित करता हैं।
या,
चुंबकीय क्षेत्र रेखा चुंबकीय क्षेत्र में स्थित ऐसे वक्र पथ हैं जो चुंबकीय क्षेत्र की दिशा को प्रदर्शित करता हैं।
चित्र 1: चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ
चुंबकीय बल रेखाओं के गुण (Properties of magnetic lines of force)
चुंबकीय बल रेखाओं के निम्नलिखित गुण हैं:
- चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ एक बंद वक्र रेखा के रूप में होती हैं।
- दो चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ कभी भी एक दूसरे को प्रतिच्छेद नहीं करती हैं।
- जहाँ चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ ज्यादा घना होती हैं वहाँ चुंबकीय क्षेत्र ज्यादा प्रबल होता है।
- जहाँ चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ कम घना होती हैं वहाँ चुंबकीय क्षेत्र कम प्रबल होता है।
- चुंबक के बाहर चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ चुंबक के उत्तरी ध्रुव से निकलती हैं तथा दक्षिणी ध्रुव से चुंबक के अंदर प्रवेश करती हैं, जबकि चुंबक के अंदर चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ दक्षिणी ध्रुव से उत्तरी ध्रुव की ओर आगे बढ़ती हैं।
विधुत धारा का चुंबकीय प्रभाव (Magnetic effect of current)
1820 ई0 में ओरस्टेड (Oersted) नामक वैज्ञानिक ने यह पत्ता लगाया कि जब किसी चालक से विधुत धारा प्रवाहित की जाती हैं तब चालक के चारों ओर चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न होता हैं।
ओरस्टेड का प्रयोग (Oersted's Experiment)
- इसके प्रयोग के लिए NS एक चुंबकीय सुई (Magnetic needle) ली जाती हैं।
- एक चालक तार को चुंबकीय सुई के समांतर व्यवस्थित किया जाती हैं।
- जब उस चालक तार से धारा नहीं प्रवाहित की जाती हैं तो चुंबकीय सुई विचलित नहीं होती हैं, लेकिन जब उस चालक तार से धारा प्रवाहित की जाती हैं तो चुंबकीय सुई विचलित हो जाती हैं।
- इससे यह स्पष्ट होता है कि धारा के चारों ओर चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है।
Note: धारा की दिशा बदलने पर चुंबकीय क्षेत्र की भी दिशा बदल जाती हैं।
चित्र 2: ओरस्टेड का प्रयोग
मैक्सवेल के दक्षिण-हस्त नियम (Maxwell's right-hand rule)
Maxwell's Right-Hand Rule
यदि धारावाही तार को दाएँ हाथ की मुट्ठी में इस प्रकार पकड़ा जाए कि अंगूठा धारा की दिशा की ओर संकेत करता हो तो हाथ की अन्य अंगुलियाँ चुंबकीय क्षेत्र की बल रेखाओं की दिशा व्यक्त करती हैं।
Note: इस नियम को मैक्सवेल का कॉर्कस्क्रू नियम (corkscrew rule) भी कहते हैं।
चित्र 3: मैक्सवेल का दक्षिण-हस्त नियम
परिनालिका (Solenoid)
यह काँच या गत्ते की खोखला, बेलनाकार नली हैं जिसके ऊपर तार लपेटकर विधुत-धारा प्रवाहित करने पर 'छड़ चुंबक जैसा कार्य करता हैं जिसे परिनालिका कहते हैं।
या,
जब किसी अचालक पदार्थ के ऊपर चालक तार की कुंडली लपेट दी जाती हैं तो ऐसी व्यवस्था को परिनालिका कहते हैं।
जब किसी अचालक पदार्थ के ऊपर चालक तार की कुंडली लपेट दी जाती हैं तो ऐसी व्यवस्था को परिनालिका कहते हैं।
या,
जब किसी तार को स्प्रिंग जैसा लपेट दिया जाए तो बनी आकृति परिनालिका कहलाती हैं।
जब किसी तार को स्प्रिंग जैसा लपेट दिया जाए तो बनी आकृति परिनालिका कहलाती हैं।
NOTE: परिनालिका के अंदर चुंबकीय क्षेत्र मजबूत होता हैं लेकिन बाहर नगण्य होता हैं।
चित्र 4: परिनालिका का चुंबकीय क्षेत्र
विधुत चुंबक (Electromagnet)
परिनालिका के अंदर नर्म लोहा का छड़ रखने पर धारा के कारण छड़ चुंबकीय (Magnetised) हो जाती हैं। ऐसे छड़ को क्रोड कहते हैं तथा नर्म लोहे के ऐसे क्रोड को विधुत चुंबक कहते हैं।
Note:
1. विधुत चुंबक अस्थायी चुंबक होता हैं।
2. स्थायी चुंबक बनाने के लिए नर्म लोहे के स्थान पर इस्पात के छड़ का उपयोग किया जाता हैं।
1. विधुत चुंबक अस्थायी चुंबक होता हैं।
2. स्थायी चुंबक बनाने के लिए नर्म लोहे के स्थान पर इस्पात के छड़ का उपयोग किया जाता हैं।
चित्र 5: विधुत चुंबक
विधुत चुंबक का उपयोग (Use of electromagnet)
- इसका उपयोग लोहे के भारी टुकड़ों को उठाने में किया जाता हैं। इसलिए प्रायः क्रेन (cranes) में इसका उपयोग होता हैं।
- इसका उपयोग विधुत घंटी, माइक्रोफोन, टेलीफोन रिसीवर, टेलीविजन, लाउडस्पीकर इत्यादि में किया जाता हैं।
चित्र 6: विधुत चुंबक का उपयोग
विधुत चुंबक (अस्थायी चुंबक) एवं स्थायी चुंबक में अंतर
धारावाही परिनालिका के भीतर उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र निम्न बातों पर निर्भर करता हैं:
- परिनालिका में फेरों की संख्या: यदि तार के फेरों की संख्या अधिक होगी तो चुंबकत्व भी अधिक होगा।
- विधुत धारा का परिमाण: प्रवाहित होनेवाली विधुत-धारा का परिमाण जितना अधिक होगा चुंबकीय क्षेत्र उतना ही प्रबल होगा।
- क्रोड के पदार्थ की प्रकृति: परिनालिका में गर्म लोहे के क्रोड का व्यवहार करने पर चुंबकत्व अधिक (प्रबल) होगा।
चुंबकीय क्षेत्र में विधुत धारावाही चालक पर बल
ओरस्टेड के प्रयोग से पता चलता हैं कि चालक में प्रवाहित विधुत धारा के कारण चुंबक पर बल लगता हैं। चुंबक भी न्यूटन के गति के तृतीय नियम से विपरीत दिशा में बराबर बल धारा पर लगता हैं।
एक नाल चुंबक के ध्रुवों के बीच क्षैतिज तल में एल्युमिनियम की हल्की पत्ती के साथ एक तार को बैटरी के साथ जोड़कर धारा प्रवाहित करने पर पत्ती का एक सिरा ऊपर तथा दूसरा नीचे हो जाता हैं। इससे चुंबकीय क्षेत्र द्वारा धारा पर प्रभाव का पता चलता हैं।
Note: छड़ में विस्थापन उस समय तक अधिकतम होता हैं जब विधुत धारा की दिशा चुंबकीय क्षेत्र की दिशा के लम्बवत् होती हैं।
फ्लेमिंग का वामहस्त नियम (Fleming's left Hand Rule)
Fleming's Left Hand Rule
यदि अपने बाएँ हाथ की तीन अंगुलियाँ माध्यमा, तर्जनी एवं अंगूठे को परस्पर लम्बवत् फैलाया जाए तो तर्जनी चुंबकीय क्षेत्र की दिशा को तथा माध्यमा धारा की दिशा को दर्शाते हैं, तब अंगूठा धारावाही पर लगे बल की दिशा व्यक्त करता हैं, जिसे फ्लेमिंग का वामहस्त नियम कहते हैं।
चित्र 7: फ्लेमिंग का वामहस्त नियम
चुंबकीय क्षेत्र में विधुत धारावाही चालक पर बल लगने के कारण
हम जानते हैं कि चालक के अंदर मुक्त इलेक्ट्रॉन का प्रवाह ही विधुत धारा का कारण हैं। जब चालक को चुंबकीय क्षेत्र में रखा जाता हैं तो उन गतिशील इलेक्ट्रॉन पर बल लगते हैं जिन्हें लौरेंज बल (Lorentz force) कहते हैं। ये बल इलेक्ट्रॉनों के वेग तथा चुंबकीय क्षेत्र की दिशाओं के लम्बवत् लगते हैं। धारावाही चालक इन्हीं बलों का परिणामी बल अनुभव करता हैं।
Note:
1. यदि दो समांतर तारों में धारा एक ही दिशा में प्रवाहित होती हैं तो उसमें परस्पर आकर्षण होता हैं।
2. यदि धारा विपरीत दिशा में बहती हैं तो इनमें प्रतिकर्षण होता हैं।
1. यदि दो समांतर तारों में धारा एक ही दिशा में प्रवाहित होती हैं तो उसमें परस्पर आकर्षण होता हैं।
2. यदि धारा विपरीत दिशा में बहती हैं तो इनमें प्रतिकर्षण होता हैं।
चुंबकीय क्षेत्र में विधुत धारावाही चालक पर लगने वाला बल निम्न बातों पर निर्भर करता हैं:
- चुंबकीय क्षेत्र की सामर्थ्य पर (On the strength of magnetic field): धारावाही चालक पर लगा बल (F) चुंबकीय क्षेत्र के सामर्थ्य (B) का सीधा समानुपाती होता हैं।
अर्थात् F ∝ B - विधुत धारा के प्राबल्य पर (On the strength of electric current): धारावाही चालक पर लगा बल (F) विधुत धारा के प्राबल्य I का सीधा समानुपाती होता हैं।
अर्थात् F ∝ I - चालक की लम्बाई पर (On the length of conductor): धारावाही चालक पर लगा बल (F) चालक की लम्बाई (L) का सीधा समानुपाती होता हैं।
अर्थात् F ∝ L
Note:
(i) जब धारावाही चालक को चुंबकीय क्षेत्र के समांतर रखा जाता हैं तो किसी प्रकार के बल का अनुभव नहीं होता हैं!
(ii) चुंबकीय क्षेत्र का S.I मात्रक टेसला होता हैं।
(iii) 1 टेसला (tesla) = 1NA⁻¹ m⁻¹
(i) जब धारावाही चालक को चुंबकीय क्षेत्र के समांतर रखा जाता हैं तो किसी प्रकार के बल का अनुभव नहीं होता हैं!
(ii) चुंबकीय क्षेत्र का S.I मात्रक टेसला होता हैं।
(iii) 1 टेसला (tesla) = 1NA⁻¹ m⁻¹
फैराडे का प्रयोग (Faraday's Experiment)
इसके लिए काँच की एक चौड़ी नली ली जाती हैं जिसके दोनों सिरे कॉर्क से बंद रहते हैं। निचले कॉर्क के बीच से एक छड़ चुंबक इस तरह घुसा दिया जाता हैं कि इसका ऊपरी ध्रुव नली के अंदर रहे। ऊपर वाला कॉर्क के बीच से ताँबे की छड़ घुसा दी जाती हैं। इस छड़ के निचले सिरे पर हुक बना रहता हैं। जिससे एक-दूसरी सीधी छड़ को इस तरह लटका दिया जाता हैं कि इसका निचला छोर पारे में डूब जाए। चालक को तार, सेल, स्विच, परिवर्तनशील प्रतिरोध इत्यादि को चित्रानुसार जोड़ दिया जाता हैं।
दाब कुंजी दबाते ही परिपथ पूरा हो जाता हैं और धारा प्रवाहित होते ही नली के भीतर का तार चुंबक के उत्तरी ध्रुव के चारों ओर घूर्णन करने लगता हैं। धारा की सक्ती बढ़ने पर तार के परिभ्रमण की गति भी बढ़ जाती हैं तथा धारा की दिशा बदलने पर परिभ्रमण की दिशा भी बदल जाती हैं। विधुत मोटर की क्रिया धारा पर चुंबकीय प्रभाव पर आधारित होती हैं।
Note: विधुत मोटर की क्रिया धारा पर चुंबकीय प्रभाव पर आधारित होता हैं।
विधुत मोटर (Electric Motor)
विधुत मोटर एक ऐसा यंत्र (device) हैं, जो विधुत ऊर्जा (Electric energy) को यांत्रिक ऊर्जा (Mechanical energy) में परिवर्तित करता हैं।
उपयोग (Use): विधुत मोटर का उपयोग विधुत पंखे, विधुत कारों, सिलाई मशीनों, रेफ्रिजरेटरों, वाशिंग मशीनों, पानी पम्पों इत्यादि के निर्माण में प्रमुख घटक के रूप में किया जाता हैं।
विधुत मोटर के मुख्य भाग (Important part of electric motor)
- क्षेत्र चुंबक (Field Magnets)
- आर्मेचर (Armature)
- दिक्परिवर्तक (Commutator)
- कार्बन ब्रश (Carbon Brush)
सिद्धांत (Principle): जब एक विधुत धारावाही कुण्डली को एक समान चुंबकीय क्षेत्र में रखा जाता हैं तो उस पर एक बल आघूर्ण (Torque) लगता हैं। यह आर्मेचर में घूर्णन (rotation) उत्पन्न करता हैं।
बनावट (Construction)
विधुत मोटर में एक नाल चुंबक होता हैं। जिसे क्षेत्र चुंबक कहते हैं। चुंबक के ध्रुव खण्डों के बीच नर्म लोहे के प्लेटों से बने क्रोड पर लिपटी ताँबे तार की कुंडली होती हैं जिसके फेरों की संख्या काफी अधिक होती हैं। इसे मोटर का आर्मेचर कहते हैं। आर्मेचर का तार ताँबे का होता हैं। इसके तार का छोर पीतल के खंडित वलयों से जुड़े रहते हैं। इन वलयों (rings) को कार्बन के ब्रश स्पर्श करते रहते हैं।
क्रिया (Working)
जब आर्मेचर से विधुतधारा प्रवाहित की जाती हैं तो आर्मेचर की दो भुजाएँ AB तथा CD जो चुंबकीय क्षेत्र की दिशा के लम्बवत् होती हैं, जो फ्लेमिंग के वामहस्त नियमानुसार बल का अनुभव करती हैं। ये बल मान में बराबर परन्तु दिशा में विपरीत होते हैं। इसलिए ये बल-युग्म (Couple) बनते हैं जिसके कारण आर्मेचर घूर्णित होता हैं। आधे घूर्णन के बाद जब CD भुजा ऊपर चली जाती हैं और AB भुजा नीचे आ जाती हैं तो वलयों के स्थान का अदला-बदली हो जाती हैं एवं आर्मेचर पर लगा बल युग्म आर्मेचर को लगातार एक ही दिशा में घुमाता रहता हैं।
चित्र 9: विधुत मोटर की क्रिया
विधुत चुंबकीय प्रेरण (Electromagnetic Induction)
परिभाषा: परिवर्ती चुंबकीय क्षेत्र के कारण किसी चालक में धारा उत्पन्न होने की घटना को विधुत चुंबकीय प्रेरण कहते हैं।
या,
जब किसी कुण्डली के भीतर चुंबकीय क्षेत्र बढ़ता या घटता हैं, तब कुण्डली में विधुत वाहक बल प्रेरित होता हैं जिसके फलस्वरूप कुण्डली में प्रेरित धारा प्रवाहित होती हैं। इस प्रभाव को विधुत चुंबकीय प्रेरणा कहते हैं।
जब किसी कुण्डली के भीतर चुंबकीय क्षेत्र बढ़ता या घटता हैं, तब कुण्डली में विधुत वाहक बल प्रेरित होता हैं जिसके फलस्वरूप कुण्डली में प्रेरित धारा प्रवाहित होती हैं। इस प्रभाव को विधुत चुंबकीय प्रेरणा कहते हैं।
Note:
1. 1831 ई0 में इंग्लैंड में माइकल फैराडे एवं अमेरिका में जोसफ हेनरी ने स्वतंत्र रूप से दिखाया कि एक गतिमान चुंबक एक तार में विधुत धारा प्रवाहित कर सकता हैं।
2. दोनों ने यह खोज लगभग एक ही समय में की परन्तु फैराडे ने परिणाम को पहले प्रकाशित किया। इसलिए विधुत चुंबकीय प्रेरण की खोज का मुख्य श्रेय फैराडे को दिया जाता हैं।
3. जोसफ हेनरी के सम्मान में प्रेरकत्व (Inductance) का S.I मात्रक का नाम हेनरी (Henry, H) दिया गया।
4. माइकल फैराडे के सम्मान में धारिता (capacitance) के S.I मात्रक का नाम फाराड (Farad, F) दिया गया।
5. विधुत जनित्र तथा ट्रांसफॉर्मर विधुत चुंबकीय प्रेरण पर आधारित हैं।
1. 1831 ई0 में इंग्लैंड में माइकल फैराडे एवं अमेरिका में जोसफ हेनरी ने स्वतंत्र रूप से दिखाया कि एक गतिमान चुंबक एक तार में विधुत धारा प्रवाहित कर सकता हैं।
2. दोनों ने यह खोज लगभग एक ही समय में की परन्तु फैराडे ने परिणाम को पहले प्रकाशित किया। इसलिए विधुत चुंबकीय प्रेरण की खोज का मुख्य श्रेय फैराडे को दिया जाता हैं।
3. जोसफ हेनरी के सम्मान में प्रेरकत्व (Inductance) का S.I मात्रक का नाम हेनरी (Henry, H) दिया गया।
4. माइकल फैराडे के सम्मान में धारिता (capacitance) के S.I मात्रक का नाम फाराड (Farad, F) दिया गया।
5. विधुत जनित्र तथा ट्रांसफॉर्मर विधुत चुंबकीय प्रेरण पर आधारित हैं।
चित्र 11: फ्लेमिंग का दक्षिण-हस्त नियम
फ्लेमिंग का दक्षिण-हस्त नियम (Fleming's Right Hand Rule)
Fleming's Right Hand Rule
इसके लिए अपने दाहिने हाथ की तीन अंगुलियाँ तर्जनी, माध्यमा और अंगूठे को परस्पर लम्बवत् फैलाते हैं। यदि तर्जनी चुंबकीय क्षेत्र की दिशा को तथा अंगूठा चालक की गति की दिशा को व्यक्त करे तो माध्यमा चालक में प्रेरित धारा की दिशा को व्यक्त करेगी।
चुंबकीय फ्लक्स (Magnetic Flux)
किसी समतल सतह जिस पर सभी जगह चुंबकीय क्षेत्र का मान तथा दिशा दोनों समान हो तो सतह के चुंबकीय क्षेत्र के अभिलंब घटक तथा सतह के क्षेत्रफल के गुणनफल को सतह का चुंबकीय फ्लक्स कहते हैं।
इसे प्रायः Φ (फाई) से सूचित किया जाता हैं तथा इसका S.I मात्रक वेबर (weber) होता हैं।
Note: चुंबकीय क्षेत्र के साथ जब सतह का झुकाव बदलता हैं तो चुंबकीय फ्लक्स में बदलाव आ जाता हैं।
फैराडे का विद्युत चुंबकीय प्रेरण नियम (Faraday's law of electromagnetic Induction)
किसी परिपथ में प्रेरित विधुत वाहक बल का परिणाम उस परिपथ से होकर जाने वाली चुंबकीय बल रेखाओं के परिवर्तन की दर तथा परिपथ में फेरों की संख्या के समानुपाती होता हैं।
लेंज का नियम (Lenz's law)
जब कभी विधुत चुंबकीय प्रेरण से किसी परिपथ में धारा उत्पन्न होती हैं तो उसकी दिशा ऐसी होती हैं कि वह उस कारण का ही विरोध करती हैं, जिससे वह उत्पन्न होती हैं। इसे ही लेंज का नियम कहते हैं।
विधुत जनित्र (Electric generator)
विधुत जनित्र (डायनेमो) एक ऐसी युक्ति (device) हैं जो यांत्रिक ऊर्जा को विधुत ऊर्जा में परिवर्तित करता हैं।
सिद्धांत (Principles): विधुत जनित्र विधुत चुंबकीय प्रेरण सिद्धांत पर आधारित हैं। विधुत जनित्र द्वारा विधुत उत्पन्न करने के लिए चुंबकीय क्षेत्र में चालक के घूर्णन के लिए यांत्रिक ऊर्जा का उपयोग किया जाता हैं।
विधुत जनित्र दो प्रकार के होते हैं:
1. प्रत्यावर्ती विधुत जनित्र या प्रत्यावर्तित्र (A.C generator or Alternator)
2. दिष्ट धारा जनित्र या डायनेमो (D.C generator or Dynamo)
1. प्रत्यावर्ती विधुत जनित्र या प्रत्यावर्तित्र (A.C generator or Alternator)
2. दिष्ट धारा जनित्र या डायनेमो (D.C generator or Dynamo)
प्रत्यावर्ती विधुत जनित्र (A.C generator)
बनावट (Construction)
साधारण विधुत जनित्र में एक शक्तिशाली नाल चुंबक होता हैं जिसे क्षेत्र चुंबक कहते हैं। क्षेत्र चुंबक के ध्रुवों के बीच क्षैतिज अक्ष पर एक कुंडली घुमती हैं जिसे आर्मेचर कहते हैं! आर्मेचर में कुंडली के अनेक फेरे होते हैं जो नर्म लोहे की पट्टियों पर लिपटे रहते हैं। इसे आर्मेचर का क्रोड कहते हैं। आर्मेचर का तार ताँबे का होता हैं। इसके तार का छोर पीतल के वलयों से ढँके रहते हैं। इन वलयों को कार्बन के दो पत्तियाँ हल्का स्पर्श करती हैं। इन पत्तियों को ब्रश कहा जाता हैं। परिपथ में इन्हीं ब्रश में लगे पेंचों से जोड़ देने पर परिपथ में धारा प्रवाहित होने लगती हैं।
क्रिया (Working)
जब कुंडली को चुंबक के ध्रुवों N और S के बीच घड़ी की सुई की विपरीत दिशा में घुमाया जाता हैं, तब CD नीचे तथा AB ऊपर की दिशा में आ जाता हैं। फ्लेमिंग के दक्षिण-हस्त नियमानुसार धारा A से B और C से D की ओर बहती हैं पुनः दूसरे अर्ध चक्र में प्रेरित विधुत वाहक बल DCBA में होगा जो पहले की दिशा के विपरीत हैं इससे पता चलता हैं कि प्रत्येक घूर्णन के आधे चक्र में धारा की दिशा बदल जाती हैं।
चित्र 12: प्रत्यावर्ती जनित्र की क्रिया (चरण 1)
चित्र 13: प्रत्यावर्ती जनित्र की क्रिया (चरण 2)
दिष्ट धारा जनित्र या डायनेमो (D.C generator or Dynamo)
ऐसा डायनेमो जिससे दिष्ट धारा प्राप्त होती हैं D.C डायनेमो कहलाता हैं। दिष्ट धारा डायनेमो की बनावट लगभग प्रत्यावर्ती धारा डायनेमो के समान ही होती हैं लेकिन अंतर सिर्फ इतना ही होता हैं कि आर्मेचर के छोरों पर एक ही वलय के आधे-आधे भाग अलग-अलग ढँके रहते हैं।
चित्र 14: दिष्ट धारा जनित्र (डायनेमो)
प्रत्यावर्ती धारा एवं दिष्ट धारा में अंतर (Difference between AC & DC)
प्रत्यावर्ती धारा से लाभ एवं हानि (Advantages and Disadvantages of A.C)
प्रत्यावर्ती धारा से लाभ (Advantages of Ac):
- इसकी वोल्टता को ट्रांसफॉर्मर द्वारा आवश्यकतानुसार कम या अधिक किया जा सकता हैं।
- प्रत्यावर्ती धारा वाले यंत्र अधिक शक्तिशाली होते हैं।
- इसको चौक की सहायता से बिना विधुत ऊर्जा की हानि के घटाया जा सकता हैं।
प्रत्यावर्ती धारा से हानियाँ (Disadvantages of AC):
- प्रत्यावर्ती धारा, दिष्ट धारा से अधिक खतरनाक होती हैं।
- प्रत्यावर्ती धारा से बैटरी का आवेशन (Charging) नहीं किया जा सकता हैं।
- इससे विधुत अपघटन (Electrolysis) नहीं किया जा सकता हैं।
- इसका उपयोग विधुत चुंबक नहीं किया जा सकता हैं।
- इसका स्पर्श मात्र का झटका काफी घातक होता हैं।
- इसको संचायक सेल में संचित नहीं किया जा सकता हैं।
जीवित तार और उदासीन तार क्या हैं?
विधुत आपूर्ति स्त्रोत से दो तार जोड़े जाते हैं। एक तार 220 V पर और दूसरा तार पृथ्वी से 0 v पर होते हैं। 220 V के तार को जीवित तार तथा 0 V के तार को उदासीन तार कहते हैं। इसे क्रमशः गर्म तथा ठंडा तार भी कहते हैं।
घरेलू वायरिंग में ठंडा, गर्म तथा अर्थ तार क्या हैं?
घरेलू वायरिंग में तीन तार होते हैं; ठंडा, गर्म तथा अर्थ तार। स्रोत से प्रत्यावर्ती धारा गर्म तार से प्रवाहित होती हैं और ठंडे तार से। लौटती हुई मानी जाती हैं और अर्थ तार जो जमीन के अंदर 5m नीचे गड़ी धातु की प्लेट से जुड़ा रहता हैं, अनावश्यक प्रवाह को प्रवाहित कर देता हैं।
पावर तथा घरेलू (Domestic) वायरिंग क्या हैं?
घरों की वायरिंग दो प्रकार की होती हैं, पावर तथा डोमेस्टिक (घरेलू)। घरेलू उपयोग के लिए 220 V तथा 50Hz की प्रत्यावर्ती धारा द्वारा मेन लाइन से ऊर्जा की आपूर्ति होती हैं। घरों के कुछ उपकरण हीटर, आयरन आदि के उपयोग में 15 A की धारा मेन लाइन से ली जाती हैं जिसे पावर लाइन कहते हैं, जबकि घरों के कुछ उपकरण बल्ब, पंखा आदि के उपयोग में 5 A की धारा मेन लाइन से ली जाती हैं जिसे घरेलू लाइन कहते हैं।
घरों में विधुत परिपथ की व्यवस्था किस प्रकार की जाती हैं?
आपूर्तिवाले मुख्य तार से दो तारों को जोड़ा जाता हैं। ये सर्वप्रथम घरों में प्रवेश करते ही मीटर से जोड़ दिया जाता हैं। गर्म तार को फ्यूज से जोड़कर मेन स्विच से जोड़ दिया जाता हैं। इससे विधुतीय उपकरणों को समांतर क्रम में जोड़ दिया जाता हैं। दूसरे ठंडे तार को भूमिगत जोड़ दिया जाता हैं।