Class 10 Biology जीवन प्रक्रम | Life Processes | Bihar Board Matric Exam 2027

कक्षा 10 · जीव विज्ञान

जीवन प्रक्रम (Life Processes)

पोषण, श्वसन, परिवहन और उत्सर्जन — पूरे अध्याय के विस्तृत, सचित्र और परीक्षा-केंद्रित नोट्स।

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जीवन प्रक्रम क्या हैं?

वे सभी आवश्यक क्रियाएँ जो एक जीव को जीवित बनाए रखने और उसके शरीर को बनाए रखने (maintenance) के लिए करनी पड़ती हैं, जीवन प्रक्रम कहलाती हैं। उदाहरण के लिए — पोषण, श्वसन, परिवहन और उत्सर्जन।

क्यों ज़रूरी है? एक स्थिर जीव (जैसे पौधा) में भी अणुओं की गति और ऊर्जा-उत्पादन जैसी क्रियाएँ लगातार चलती रहती हैं, भले ही बाहर से कोई हलचल न दिखे। इसलिए "गति" जीवित होने की कसौटी नहीं है — जीवन प्रक्रमों का चलते रहना ही जीवित होने का प्रमाण है।
  • पोषण — शरीर के लिए ऊर्जा और कच्चा माल (raw material) प्राप्त करना।
  • श्वसन — भोजन को तोड़कर ऊर्जा (ATP) मुक्त करना।
  • परिवहन — पोषक तत्वों, गैसों और उत्सर्जी पदार्थों को शरीर में एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाना।
  • उत्सर्जन — शरीर में बने हानिकारक अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालना।
पोषण की आवश्यकता — बाहरी कच्चा माल क्यों? जटिल बहुकोशिकीय जीवों में हर कोशिका सीधे बाहरी वातावरण से संपर्क में नहीं होती, इसलिए साधारण विसरण (diffusion) से सभी कोशिकाओं तक पदार्थ पहुँचाना संभव नहीं है। इसीलिए विशेष पोषण, श्वसन, परिवहन व उत्सर्जन तंत्र विकसित हुए हैं जो हर कोशिका तक ज़रूरी पदार्थ पहुँचाते और अपशिष्ट बाहर निकालते हैं।
Biology Class 10 Notes

पोषण (Nutrition)

जीव द्वारा भोजन ग्रहण करने और शरीर में उसका उपयोग करने की प्रक्रिया को पोषण कहते हैं। पोषण के तरीके के आधार पर दो प्रकार हैं:

🌿 स्वपोषी पोषण (Autotrophic)

जीव सरल अकार्बनिक पदार्थों (CO₂, जल) से सूर्य के प्रकाश की मदद से स्वयं अपना भोजन बनाते हैं। उदाहरण — हरे पौधे, नीले-हरे शैवाल।

🍽️ विषमपोषी पोषण (Heterotrophic)

जीव अपना भोजन स्वयं नहीं बना सकते और दूसरे जीवों पर निर्भर रहते हैं। उदाहरण — मनुष्य, कवक (fungi), परजीवी।

प्रकाश-संश्लेषण (Photosynthesis)

हरे पौधे सूर्य के प्रकाश, क्लोरोफिल, जल और कार्बन डाइऑक्साइड की मदद से ग्लूकोज़ और ऑक्सीजन बनाते हैं। प्रकाश-संश्लेषण में मुख्यतः तीन घटनाएँ एक साथ होती हैं:

  1. प्रकाश का अवशोषण — क्लोरोफिल द्वारा सूर्य के प्रकाश को ग्रहण करना।
  2. प्रकाश ऊर्जा का रासायनिक ऊर्जा में रूपांतरण व जल का अपघटन — अवशोषित प्रकाश ऊर्जा, ATP व NADH (रासायनिक ऊर्जा) में बदलती है और साथ ही जल के अणु ऑक्सीजन (O₂), हाइड्रोजन तथा इलेक्ट्रॉन में टूटते हैं।
  3. कार्बन डाइऑक्साइड का अपचयन — CO₂ को कार्बोहाइड्रेट (ग्लूकोज़) में अपचयित (reduce) किया जाता है, जिसमें उपरोक्त चरण की ऊर्जा का उपयोग होता है।
प्रकाश-संश्लेषण
चित्र: पत्ती में प्रकाश-संश्लेषण — सूर्य का प्रकाश ऊर्जा देता है, जड़ से जल व पत्तियों से CO₂ मिलकर ग्लूकोज़ व ऑक्सीजन बनाते हैं।
Source: Wikimedia Commons — At09kg/Wattcle/Nefronus (CC BY-SA 4.0)
रासायनिक समीकरण 6CO₂ + 6H₂O — (सूर्य का प्रकाश, क्लोरोफिल) → C₆H₁₂O₆ (ग्लूकोज़) + 6O₂

प्रकाश-संश्लेषण के लिए आवश्यक चीज़ें

  • सूर्य का प्रकाश (ऊर्जा का स्रोत)
  • क्लोरोफिल (हरा वर्णक, क्लोरोप्लास्ट में मौजूद)
  • कार्बन डाइऑक्साइड (पत्तियों के रंध्रों/stomata से)
  • जल (जड़ों द्वारा मिट्टी से अवशोषित)

रंध्र (Stomata) और द्वार कोशिकाएं (Guard Cells)

रंध्र पत्ती की सतह पर मौजूद छोटे-छोटे छिद्र हैं जिनसे गैसों का आदान-प्रदान (CO₂ अंदर, O₂ व जलवाष्प बाहर) होता है। इनके खुलने व बंद होने को द्वार कोशिकाएं नियंत्रित करती हैं — जब द्वार कोशिकाओं में जल भरता है (स्फीति दाब बढ़ता है) तो रंध्र खुलते हैं, और जल कम होने पर बंद हो जाते हैं।

विषमपोषी पोषण के प्रकार

प्रकारविशेषताउदाहरण
परजीवी (Parasitic)जीवित परपोषी के शरीर से सीधे भोजन लेनाकुकुरमुत्ता, जूँ, फीताकृमि
मृतजीवी (Saprophytic)मृत/सड़े हुए कार्बनिक पदार्थ से भोजन लेनाफफूंद (कवक), यीस्ट
प्राणीसमपोषी (Holozoic)ठोस भोजन को शरीर में लेकर पचानामनुष्य, अमीबा, अधिकतर जंतु

उदाहरण: अमीबा में पोषण (Holozoic Nutrition)

अमीबा जैसे एककोशिकीय जीव में प्राणीसमपोषण पाँच चरणों में होता है:

  1. अंतर्ग्रहण (Ingestion) — कूटपाद (pseudopodia) की मदद से भोजन को घेरकर खाद्य धानी (food vacuole) में बंद करना।
  2. पाचन (Digestion) — खाद्य धानी में एंज़ाइम भोजन को घोलकर सरल पदार्थों में तोड़ते हैं।
  3. अवशोषण (Absorption) — पचे पदार्थ कोशिकाद्रव्य में विसरित होते हैं।
  4. स्वांगीकरण (Assimilation) — अवशोषित पदार्थों का उपयोग वृद्धि व ऊर्जा के लिए किया जाता है।
  5. बहिष्करण (Egestion) — अपचित भोजन कोशिका सतह पर लाकर बाहर निकाल दिया जाता है।

मानव पाचन तंत्र (Human Digestive System)

मनुष्य में भोजन मुख से लेकर गुदा तक की एक लंबी नली (आहारनाल) से होकर गुजरता है, जहाँ यह चरणबद्ध तरीके से पचता है।

मानव पाचन तंत्र
चित्र: भोजन मुख → ग्रासनली → आमाशय → छोटी आंत → बड़ी आंत → मलाशय के रास्ते से गुज़रता है।
Source: Wikimedia Commons — Mariana Ruiz (LadyofHats), Public domain

पाचन के मुख्य चरण (विस्तार से)

  1. मुख (Buccal Cavity) — दाँत (कृंतक, रदनक, अग्रचर्वणक, चर्वणक) भोजन को चबाकर छोटे टुकड़ों में बदलते हैं; जीभ भोजन को मिलाती है। तीन जोड़ी लार ग्रंथियाँ (कर्णपूर्व, अधोजिह्वा, अधोहनु) लार स्रावित करती हैं, जिसमें मौजूद लार एमाइलेज़ स्टार्च को शर्करा में तोड़ना शुरू करता है।
  2. ग्रासनली (Esophagus) — क्रमाकुंचन गति (peristalsis, नली की मांसपेशियों का लयबद्ध संकुचन) से भोजन आमाशय तक धकेला जाता है।
  3. आमाशय (Stomach) — भोजन को मथकर (churning) मिलाया जाता है; जठर ग्रंथियाँ HCl (भोजन के साथ आए जीवाणु नष्ट करता है, अम्लीय माध्यम बनाकर पेप्सिनोजन को सक्रिय पेप्सिन में बदलता है) और पेप्सिन (प्रोटीन को तोड़ता है) स्रावित करती हैं; श्लेष्मा (mucus) आमाशय की भित्ति को अम्ल से बचाता है।
  4. छोटी आंत (Small Intestine) — तीन भाग: ग्रहणी (duodenum), मध्यांत्र (jejunum) और शेषांत्र (ileum)। यकृत से पित्त (वसा को इमल्सीकृत करता है) और अग्न्याशय से एंज़ाइम (ट्रिप्सिन, एमाइलेज़, लाइपेज़) यहीं आकर मिलते हैं; यहीं पूर्ण पाचन और अवशोषण होता है (क्षुद्रांत्र की भित्ति में मौजूद अंगुलिनुमा विलाई/villi रक्त वाहिकाओं से घिरी होती हैं और अवशोषण क्षेत्र बहुत बढ़ा देती हैं)।
  5. बड़ी आंत (Large Intestine) — कोलन में बचे हुए जल व कुछ लवणों का अवशोषण होता है, ठोस मल बनता है जो मलाशय (rectum) में जमा होकर गुदा (anus) से बाहर निकलता है (इसे बहिष्करण (egestion) कहते हैं)।
यकृत व अग्न्याशय — पाचन की दो मुख्य ग्रंथियाँ यकृत शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि है; यह पित्त रस बनाता है जो पित्ताशय (gallbladder) में जमा होकर छोटी आंत में छोड़ा जाता है और वसा की बड़ी बूंदों को छोटी बूंदों में तोड़ता (इमल्सीकरण) है, जिससे लाइपेज़ का काम आसान हो जाता है। अग्न्याशय मिश्रित ग्रंथि है — यह अग्न्याशयी रस (ट्रिप्सिन, एमाइलेज़, लाइपेज़) बनाता है और इंसुलिन हार्मोन भी स्रावित करता है।

मुख्य पाचक एंज़ाइम

एंज़ाइमस्रोतकार्य
लार एमाइलेज़लार ग्रंथिस्टार्च → शर्करा
पेप्सिनआमाशयप्रोटीन → पेप्टोन
ट्रिप्सिनअग्न्याशयप्रोटीन → अमीनो अम्ल
लाइपेज़अग्न्याशयवसा → वसा अम्ल + ग्लिसरॉल
पित्त रसयकृत (पित्ताशय में जमा)वसा का इमल्सीकरण (एंज़ाइम नहीं है)
आंत्र रस (succus entericus)छोटी आंत की भित्तिपाचन को अंतिम रूप से पूर्ण करता है

श्वसन (Respiration)

भोजन (ग्लूकोज़) के विखंडन से ऊर्जा (ATP) प्राप्त करने की प्रक्रिया को श्वसन कहते हैं। यह कोशिका के कोशिकाद्रव्य (cytoplasm) में शुरू होकर माइटोकॉन्ड्रिया में पूरा होता है।

श्वसन बनाम श्वास-क्रिया — अंतर याद रखें श्वास-क्रिया (Breathing) एक भौतिक (physical) प्रक्रिया है — फेफड़ों में हवा का अंदर-बाहर आना-जाना। श्वसन (Respiration) एक रासायनिक (chemical) प्रक्रिया है — कोशिकाओं के अंदर भोजन को तोड़कर ऊर्जा निकालना। श्वास-क्रिया, श्वसन का केवल एक भाग है।
आधारवायवीय श्वसन (Aerobic)अवायवीय श्वसन (Anaerobic)
ऑक्सीजनआवश्यक हैआवश्यक नहीं
स्थानकोशिकाद्रव्य + माइटोकॉन्ड्रियाकेवल कोशिकाद्रव्य
अंतिम उत्पादCO₂ + जलएथेनॉल + CO₂ (यीस्ट में) या लैक्टिक अम्ल (मांसपेशी में)
ऊर्जा उत्पादनअधिक (लगभग 38 ATP)कम (लगभग 2 ATP)
उदाहरणमनुष्य व अधिकतर जीवयीस्ट (किण्वन), थकी हुई मांसपेशी
रोचक तथ्य तेज़ दौड़ने के बाद जब मांसपेशियों को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती, तो वे अवायवीय श्वसन से लैक्टिक अम्ल बनाती हैं, जिसके जमा होने से मांसपेशियों में ऐंठन (cramps) होती है।

विभिन्न जीवों में श्वसन अंग

जीव के निवास-स्थान व शरीर-रचना के अनुसार श्वसन अंग अलग-अलग होते हैं:

जीवश्वसन अंग
केंचुआत्वचा (नम त्वचा से गैस विसरण)
मछलीक्लोम (Gills) — जल में घुली ऑक्सीजन ग्रहण करते हैं
कीट (जैसे तिलचट्टा)श्वास-रंध्र (spiracles) व श्वास-नलिकाएं (tracheae)
मनुष्य व अन्य स्थलीय कशेरुकीफेफड़े (Lungs)

मानव श्वसन तंत्र (Human Respiratory System)

मानव श्वसन तंत्र
चित्र: वायु नासा गुहा → श्वासनली → फेफड़ों में शाखाओं (bronchi/bronchioles) से गुज़रकर कूपिकाओं (alveoli) तक पहुँचती है, जहाँ गैसों का आदान-प्रदान होता है।
Source: Wikimedia Commons — LadyofHats, Public domain

श्वास लेने की क्रियाविधि (Breathing Mechanism)

श्वास अंदर लेना (Inhalation)

पसलियों की मांसपेशियाँ पसलियों को ऊपर-बाहर उठाती हैं और डायाफ्राम सिकुड़कर चपटा होकर नीचे जाता है — इससे वक्ष गुहा (chest cavity) का आयतन बढ़ता है, दाब घटता है और हवा फेफड़ों में खिंच आती है।

श्वास बाहर छोड़ना (Exhalation)

पसलियाँ नीचे-अंदर आती हैं और डायाफ्राम ढुम्मददार आकार में ऊपर उठता है — वक्ष गुहा का आयतन घटता है, दाब बढ़ता है और हवा फेफड़ों से बाहर निकल जाती है।

  • कूपिका (Alveoli) — फेफड़ों में मौजूद लाखों छोटी थैलियाँ, जिनमें रक्त-कोशिकाओं का जाल बिछा होता है — यही गैसों के आदान-प्रदान का स्थान है। इनकी संख्या अधिक होने से सतह क्षेत्रफल बहुत बढ़ जाता है, जिससे गैसों का विसरण तेज़ी से होता है।
  • हीमोग्लोबिन — लाल रक्त कोशिकाओं में मौजूद वर्णक जो ऑक्सीजन से जुड़कर (ऑक्सीहीमोग्लोबिन बनाकर) उसे शरीर की कोशिकाओं तक ले जाता है।
  • कार्बन डाइऑक्साइड का परिवहन — अधिकांश CO₂ (लगभग 70%) प्लाज़्मा में बाइकार्बोनेट (bicarbonate) के रूप में घुलकर, कुछ हीमोग्लोबिन से जुड़कर और थोड़ी मात्रा सीधे प्लाज़्मा में घुलकर फेफड़ों तक पहुँचाई जाती है।

परिवहन (Transportation)

पोषक तत्वों, गैसों, हार्मोन और उत्सर्जी पदार्थों को शरीर के एक भाग से दूसरे भाग तक पहुँचाने की प्रक्रिया।

मानव में परिवहन — हृदय (Heart)

मानव हृदय चार कक्षों (chambers) का बना होता है — दो अलिंद (atria) ऊपर और दो निलय (ventricles) नीचे। ऑक्सीजनित व अऑक्सीजनित रक्त को अलग रखने के लिए यह विभाजन ज़रूरी है, ताकि शरीर को ऑक्सीजन-युक्त रक्त कुशलता से मिल सके — इसे दोहरा परिसंचरण (double circulation) कहते हैं।

मानव हृदय
चित्र: नीला भाग = अऑक्सीजनित रक्त (शरीर से फेफड़ों की ओर), लाल भाग = ऑक्सीजनित रक्त (फेफड़ों से शरीर की ओर)।
Source: Wikimedia Commons — ZooFari (CC BY-SA 3.0)

एकल परिसंचरण बनाम दोहरा परिसंचरण

आधारएकल परिसंचरण (Single)दोहरा परिसंचरण (Double)
परिभाषारक्त प्रति चक्र में हृदय से केवल एक बार गुज़रता हैरक्त प्रति चक्र में हृदय से दो बार गुज़रता है
उदाहरणमछलीमनुष्य, पक्षी, स्तनधारी
दक्षताकम दाब से रक्त प्रवाहित होता हैऊतकों को ऑक्सीजन-युक्त रक्त उच्च दाब व दक्षता से मिलता है

रक्त के घटक (Components of Blood)

घटककार्य
प्लाज़्मा (Plasma)भोजन, हार्मोन, CO₂ और उत्सर्जी पदार्थों का परिवहन
लाल रक्त कोशिकाएं (RBC)हीमोग्लोबिन द्वारा ऑक्सीजन का परिवहन
श्वेत रक्त कोशिकाएं (WBC)संक्रमण से शरीर की रक्षा
प्लेटलेट्स (Platelets)रक्त का थक्का बनाना (clotting)

रक्त वाहिकाएं

  • धमनी (Artery) — हृदय से शरीर के अंगों तक ऑक्सीजनित रक्त (फुफ्फुसीय धमनी को छोड़कर) ले जाती है; मोटी, लचीली व दृढ़ दीवार जो उच्च दाब सह सके।
  • शिरा (Vein) — अंगों से हृदय तक अऑक्सीजनित रक्त (फुफ्फुसीय शिरा को छोड़कर) वापस लाती है; इनमें कपाट (valves) होते हैं ताकि रक्त उल्टा न बहे।
  • केशिका (Capillary) — बहुत पतली, एक-कोशिका-मोटी वाहिकाएं जहाँ रक्त और ऊतकों के बीच पदार्थों का आदान-प्रदान होता है।
लसीका तंत्र (Lymphatic System) रक्त केशिकाओं से कुछ द्रव ऊतकों में रिसकर लसीका (lymph) बनाता है, जो वापस रक्त में मिल जाता है। लसीका वसा के अवशोषण में मदद करती है और संक्रमण से लड़ने में भी सहायक है।

पौधों में परिवहन

जाइलम (Xylem)

जड़ से जल और खनिज लवणों को पत्तियों तक ऊपर की ओर ले जाता है। दिन में यह गति मुख्यतः वाष्पोत्सर्जन खिंचाव (transpiration pull) से होती है — पत्तियों से जल का वाष्पीकरण एक चूषण बल बनाता है जो जाइलम में जल को ऊपर खींचता है। रात में जड़ों में मूल दाब (root pressure) जल को ऊपर धकेलने में मदद करता है, जिससे कभी-कभी पत्तियों के किनारों से जल की बूंदें रिसती हैं (इसे बिंदुस्राव/guttation कहते हैं)।

फ्लोएम (Phloem)

पत्तियों में बने भोजन (सुक्रोज़) को पौधे के अन्य भागों तक ऊपर व नीचे दोनों दिशाओं में पहुँचाता है — इसे स्थानांतरण (translocation) कहते हैं। चालनी नलिकाओं (sieve tubes) से सटी सहचर कोशिकाएं (companion cells) ऊर्जा (ATP) का उपयोग करके भोजन-स्रोत (source, जैसे पत्ती) से भोजन-सिंक (sink, जैसे जड़, फल) की ओर परासरण दाब बढ़ाकर पदार्थों को स्थानांतरित करती हैं — इसीलिए यह वायवीय, ऊर्जा-चालित (active) प्रक्रिया है।

उत्सर्जन (Excretion)

शरीर की उपापचयी क्रियाओं (metabolism) से बने हानिकारक अपशिष्ट पदार्थों को शरीर से बाहर निकालने की प्रक्रिया को उत्सर्जन कहते हैं।

विभिन्न जीवों में उत्सर्जी पदार्थ

वर्गउत्सर्जी पदार्थउदाहरण
जलीय जंतुअमोनिया (अत्यंत विषैली, अधिक जल में घुलनशील — बहुत पानी चाहिए)मछली
स्थलीय जंतुयूरिया (कम विषैली, कम जल में उत्सर्जित)मनुष्य व अन्य स्तनधारी
पक्षी, सरीसृप, कीटयूरिक अम्ल (अर्ध-ठोस पेस्ट — बहुत कम जल की हानि)पक्षी, छिपकली
एककोशिकीय जीवविसरण या संकुचनशील धानी (contractile vacuole) द्वाराअमीबा, पैरामीशियम

मानव उत्सर्जन तंत्र (Human Excretory System)

वृक्क व नेफ्रॉन
चित्र: प्रत्येक वृक्क में लाखों निस्पंदन इकाइयाँ (नेफ्रॉन) होती हैं, जो रक्त को छानकर मूत्र बनाती हैं।
Source: Wikimedia Commons — Burton Radons (CC0 / Public domain)

नेफ्रॉन की संरचना (Structure of Nephron)

नेफ्रॉन वृक्क की मूल संरचनात्मक व कार्यात्मक इकाई है। इसके मुख्य भाग:

  1. बोमन संपुट (Bowman's Capsule) व गुच्छिका (Glomerulus) — रक्त वाहिकाओं का गुच्छा जिसके चारों ओर कप-नुमा संपुट होता है; यहाँ रक्त का निस्पंदन (filtration) होता है — जल, ग्लूकोज़, अमीनो अम्ल, लवण व यूरिया छनकर नलिका में जाते हैं (बड़े प्रोटीन व रक्त कोशिकाएं नहीं छनतीं)।
  2. समीपस्थ संवलित नलिका (PCT) — यहाँ ग्लूकोज़, अमीनो अम्ल, लवण और अधिकांश जल का वरणात्मक पुनरावशोषण (selective reabsorption) वापस रक्त में हो जाता है।
  3. हेनले लूप (Loop of Henle) — जल व लवणों के संतुलन को नियंत्रित करता है, मूत्र को गाढ़ा बनाने में मदद करता है।
  4. दूरस्थ संवलित नलिका (DCT) — यहाँ कुछ अतिरिक्त आयनों व अपशिष्ट का स्रावण (secretion) नलिका में होता है।
  5. संग्राहक वाहिनी (Collecting Duct) — कई नेफ्रॉनों से बना मूत्र यहाँ इकट्ठा होकर वृक्क की श्रोणि (pelvis) में जाता है, फिर मूत्रवाहिनी से मूत्राशय में।
मूत्र निर्माण की तीन मुख्य क्रियाएँ 1. निस्पंदन (Filtration) — गुच्छिका में रक्त का दाब से छनना। 2. पुनरावशोषण (Reabsorption) — उपयोगी पदार्थ नलिका से वापस रक्त में। 3. स्रावण (Secretion) — अतिरिक्त अपशिष्ट रक्त से नलिका में। इन तीनों के बाद बचा तरल ही अंतिम मूत्र है।
  1. मूत्रवाहिनी (Ureters) — मूत्र को वृक्क से मूत्राशय तक ले जाती है।
  2. मूत्राशय (Urinary bladder) — मूत्र को अस्थायी रूप से जमा करता है, जब तक इसे स्वेच्छा से बाहर नहीं निकाला जाता।
  3. मूत्रमार्ग (Urethra) — मूत्र को शरीर से बाहर निकालता है।
जानिए — डायलिसिस कैसे काम करता है जब वृक्क सही से काम नहीं करते (वृक्क विफलता), तो डायलिसिस (dialysis) से कृत्रिम रूप से रक्त छाना जाता है। रोगी का रक्त एक अर्ध-पारगम्य झिल्ली वाली नलिकाओं से गुज़ारा जाता है, जो एक विशेष डायलिसिस द्रव (dialysing fluid) से घिरी होती हैं — यह द्रव रक्त के सामान्य घटकों जैसा होता है पर इसमें यूरिया व अपशिष्ट पदार्थ नहीं होते, इसलिए अपशिष्ट सांद्रण प्रवणता (concentration gradient) के अनुसार रक्त से द्रव में विसरित हो जाते हैं, और साफ रक्त शरीर में वापस भेज दिया जाता है।

पौधों में उत्सर्जन

  • ऑक्सीजन व CO₂ — रंध्रों (stomata) के माध्यम से बाहर निकलती हैं।
  • अतिरिक्त जल — वाष्पोत्सर्जन (transpiration) द्वारा निकलता है।
  • कुछ अपशिष्ट पदार्थ पत्तियों में जमा होकर पत्ती गिरने पर शरीर से अलग हो जाते हैं, या गोंद व रेज़िन के रूप में पुराने भागों में जमा होते हैं, या टैनिन आदि के रूप में छाल व लकड़ी में संचित हो जाते हैं।

सार तालिका — चारों जीवन प्रक्रम एक नज़र में

प्रक्रमकार्यमुख्य अंग (मनुष्य)
पोषणभोजन ग्रहण व उपयोगमुख, आमाशय, आंत, यकृत, अग्न्याशय
श्वसनभोजन से ऊर्जा (ATP) मुक्त करनानाक, श्वासनली, फेफड़े
परिवहनपदार्थों को शरीर में पहुँचानाहृदय, रक्त, रक्त वाहिकाएं
उत्सर्जनअपशिष्ट पदार्थ बाहर निकालनावृक्क, मूत्रवाहिनी, मूत्राशय

मुख्य शब्दावली (Glossary)

क्लोरोफिल — पत्तियों में हरा वर्णक जो प्रकाश ऊर्जा सोखता है
विलाई (Villi) — छोटी आंत की अंगुलिनुमा रचनाएं, अवशोषण बढ़ाती हैं
एल्वियोली — फेफड़ों की गैस-आदान-प्रदान थैलियाँ
हीमोग्लोबिन — ऑक्सीजन वाहक वर्णक, RBC में मौजूद
नेफ्रॉन — वृक्क की छोटी निस्पंदन इकाई
वाष्पोत्सर्जन — पत्तियों से जल का वाष्प बनकर उड़ना
पेरिस्टलसिस — आहारनाल की भित्ति का लयबद्ध संकुचन जो भोजन को आगे धकेलता है
स्थानांतरण (Translocation) — फ्लोएम द्वारा भोजन का स्रोत से सिंक तक पहुँचना

महत्वपूर्ण प्रश्न (Exam Questions)

  1. स्वपोषी और विषमपोषी पोषण में अंतर बताइए।
  2. वायवीय व अवायवीय श्वसन में क्या अंतर है? उदाहरण सहित समझाइए।
  3. मानव हृदय में दोहरा परिसंचरण क्यों आवश्यक है?
  4. जाइलम और फ्लोएम के कार्यों में अंतर स्पष्ट कीजिए।
  5. नेफ्रॉन की संरचना और कार्य का वर्णन कीजिए।
  6. पाचन में यकृत और अग्न्याशय की भूमिका समझाइए।
  7. अमीबा में पोषण की प्रक्रिया के पाँच चरण लिखिए।
  8. श्वास-क्रिया के दौरान पसलियों व डायाफ्राम में क्या परिवर्तन होते हैं?
  9. धमनी, शिरा और केशिका में अंतर बताइए।
  10. डायलिसिस की प्रक्रिया कैसे कार्य करती है?
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